रायपुर // शराबबंदी का दावा कर सत्ता की कुर्सी पर बैठी
कांग्रेस का यह तीसरा साल शुरू हो गया है ,
लेकिन शराबबंदी को लेकर किसी भी तरीके का कोई जतन नहीं किया जा रहा है . हर बार
विधानसभा में विपक्ष कांग्रेस को गंगाजल की कसम की याद दिलाते हुए शराबबंदी को
लेकर घेरती है
और सरकार का वही रटा - रटाया जवाब रहता है कि हम एकदम से शराबबंदी करने के पक्ष
में नहीं है ,
दरअसल सरकार को शराब के उस अकूत खजाने का चस्का लग गया है. जिसको लेकर वह अपने उस
वादे को पूरा ना करके फिर
बहाने बना रही है. सरकार का यह तर्क है कि शराब बंद हो जाने से नशेड़ी दूसरे नशे
की तरफ चले जाएंगे यह पुलिस
के लिए उसी तरीके का मजाक है . की सैंया भए कोतवाल अब डर कैसा जबकि पुलिस के आला अफसर अच्छे से जानते हैं कि इस
अकूत खजाने मैं उनकी जो हिस्सेदारी है उस पर शराबबंदी का भारी असर पड़ने वाला | पुलिस यह भी दावा करती हैं कि हम अगर चाहने
तो मंदिर से चप्पल चोरी नहीं जाएगी , पुलिस नशे के धंधे करने वाले अपराधियों को अच्छी
तरीके से जानती है अवैध नशे का कारोबार करने वाले को पुलिस
क्यों नहीं रुकेगी यही तो उसका काम है , सरकार यह कहकर कैसे मुंह फेर रही है कि नशेड़ी
दूसरे नशे की तरफ चले जाएंगे पुलिस क्या हाथ पर हाथ रख कर बैठी रहेगी
छत्तीसगढ़ में शराब के धंधे ने
गांव, कसबों, शहर के बाहरी इलाकों मैं कुटीर उद्योग की तरह विकसित हो गया है हजारों
युवा कोच्चि के काम में लगे हुए हैं सरकार अपनी शराब के अलावा कोचियों को छत्तीसगढ़
की शराब फैक्ट्रियों से शराब शराब उपलब्ध करा रही है, यह इसलिए भी किया जा रहा है कि पहले जब ठेका प्रथा
थी तो जग जाहिर था कि शराब की अवैध कमाई में स्थानीय प्रशासन का एक बड़ा हिस्सा
होता था जो ठेकेदार द्वारा निश्चित समय में उनके पास पहुंचा दिया जाता था, सरकार
ने जब स्वयं शराब बेचने का निर्णय लिया तो
यह निश्चित राशि स्थानीय प्रशासन के पास पहुंचना एकदम से बंद हो गई कुछ दिनों तक
तो स्थानीय प्रशासन इस कसक को लेकर चुपचाप बैठा रहा लेकिन इसी बीच कोचियों के
सिंडिकेट ने एक फुलप्रूफ कार्यक्रम बनाकर स्थानीय प्रशासन के उच्च अधिकारियों के
सामने पेश किया शर्त सिर्फ यही थी कि हम अवैध शराब की बिक्री करेंगे आपको बता कर
करेंगे आप का हिस्सा आप तक पहुंच जाएगा आप सिर्फ हमें पकड़ेंगे नहीं क्योंकि आबकारी
एक्ट के तहत शराब के स्टाक की संख्या के
आधार पर जो धाराएं हैं वह सक्त हैं उन धाराओं से हमें बचाए रखें समझौता बहुत ही
दिलचस्प था समझौता दोनों पक्षों को
मंजूर था क्योंकि मंजिल एक थी
इस समझौते को फौरी तौर पर बिलासपुर में लागू किया गया मध्यप्रदेश से जुड़े
छत्तीसगढ़ के इलाके से बाकायदा शराब आ रही थी. और कोचियों अपने नेटवर्क
उसे सुनिश्चित स्थानों पर ले जाकर बेच रहा
था ,यदा-कदा
एकाद खबर आती थी की अवैध बिक्री की शराब पकड़ी गई ,बाकी सब कुछ मिलीभगत से ठीक-ठाक चल रहा था आज भी चल रहा है
आज सरकार को शराब बेचते हुए शानदार आठवां बरसे हो गए हैं , इन आठ वर्षों में जहां सरकार ने अपने हिस्से की शराब दुकानों से बेच रहे
हैं वही उससे दुगनी शराब कोचिये अपने नेटवर्क से पूरे छत्तीसगढ़ में बेच
रहे हैं इस पूरी सिंडिकेट में जहां कुछ पुराने ठेकेदार और बड़े कोचियों शामिल हैं ने अब इस कारोबार को कुटीर उद्योग की तरह अपना लिया
है , जिसके कारण आज गांव में शराब सरलता से उपलब्ध है उपनगरी क्षेत्रों में भी यही
स्थिति है जब यह कुटीर उद्योग के रूप में विकसित हो गया है तो अब किसी को कोई दिक्कत नहीं है, सब की
हिस्सेदारी का सामान उनके पास पहुंच रहा है .शराब पीने वालों को शराब सरलता से
उपलब्ध है|
कोचिये शराब को क्रेडिट पर ही उपलब्ध करा रहे
हैं बकायदा डायरी मेंटेन है उस हिसाब से उनको शराब दी जा रही है यह एक अतिरिक्त
सुविधा है इस सुविधा से जहां शराब पीने वाले भी खुश हैं वही कोचिंग का धंधा भी फल
फूल रहा है इस क्रेडिट शराब का मामला इतना ईमानदार है कि जैसे ही शराब पीने के वाले
के पास धान बेचने से गोबर खरीदी का पैसा उसके खाते में आता है शराबी सबसे पहले कोचिये का भुगतान करता है उसके बाद आगे का कोई
काम करता है




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