दिव्य-दूत

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रन फॉर द रिवर तकनीकी के दुष्परिणामों का ही प्रतिफल है नंदा देवी ग्लेशियर का टूटना और तबाही फैलाना

Anil Choubey 15-02-2021 19:30:09


अनिल चौबे

                            नई दिल्ली /////   रेंट फॉर द रिवर  जैसी परियोजनाओं के सपने दिखाकर प्राकृतिक रूप से  बहती हुई नदियों को , झरनों और जल स्रोतों को  उनकी मूलभूत  बहने की दिशा  से मोड़ कर  अपनी आवश्यकता के अनुसार  जल को बहाने की कोशिश के ही दुष्परिणाम हैं  ऋषि गंगा  पन बिजली  परियोजना और   तपोवन  विष्णुगाड   एनटीपीसी पनबिजली परियोजना  चमोली ,  रन फॉर द रिवर  का मतलब है कि बहती  हुई नदियों का जल कृतिम टनल से गुजार कर पनबिजली टरबाइन में भेजना और फिर उसी जल को नदी  मैं वापस छोड़ देना कहने में सुनने में तो यह बहुत ही सुहावनी परिकल्पना है लेकिन प्रकृति रूप से बहती  हुई इन नदियों को अपनी जरूरत के अनुसार मोड़  देने के प्रयासों के कारण हिमालय में यह भारी तबाही आई  है और जल के जलजला ने  इन तीनों  जल विद्युतयोजनाओं को जमींदोज कर दिया और सेकड़ों मजदुर मरे गए, नदी  अपने मुख्य मार्ग बहते हुए आगे निकल  गई अब वैज्ञानिक , , प्रशासन ,मंत्री, नेता सिर्फ बयानबाजी ही कर रहे हैं, वास्तविकता यह है कि इन परियोजनाओं के निर्माण में जो खतरनाक किस्म से हैवी ब्लास्टिंग हुई है उससे  नंदा देवी ग्लेशियर टूटा ,किसी भी ग्लेशियर की क्या खासियत होती है कि उससे लगातार पानी नीचे की ओर रिश्ता रहता है , रिसना बंद हो जाए तो भारी खतरा  है नंदा देवी ग्लेशियर से लगातार पानी रिश्ते  हुए  कई छोटी नदी का रूप  ले कर  पानी लगातार बेहतर रहता है ,कभी रुकता नहीं  स्थानी निवासियों की जानकारी के अनुसार,  पिछले कुछ महीनों से अलकनंदा ग्लेशियर से पानी बहना बंद हो गया था ग्लेशियर  ऋषि  गंगा प्रोजेक्ट के ठीक ऊपर है   इस ग्लेशियर से  निकलने वाली तमाम छोटी नदियों में पानी सूख गया था इसका मतलब है कि पानी कहीं ना कहीं  इकट्ठा हो रहा था यह ग्लेशियर के टूटने का एक खतरनाक संकेत है जिसे अन देखा  किया  गया |

                       जल विद्युत परियोजना पर काम करने वाले पूरी ताकत से भारी मशीनों के सहारे ब्लास्टिंग कर टनल का निर्माण करने में लगे थे ,वही ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट के इंजीनियर नदी में पानी का बहाव बना रहे के लिए जल स्रोतों को नदी में डाइवर्ट करने में लगे थे इस तरीके के कार्य  पर्यावरण और प्रकृति के लिए भारी नुकसान दायक होते  है ,ग्लेशियर से पानी ना बहने की बात पर ध्यान नहीं दिया और रविवार सुबह 10:30 बजे ग्लेशियर टूटा  गया जिसका  रेडियस 14 स्क्वायर किलोमीटर के बराबर था  इतने भारी भरकम ग्लेशियर के टूटने के साथ ही रुके हुए पानी के  सैलाब ने  चंद मिनटों  मैं ही तबाही का वह मंजर दिखा दिया और चेतावनी दे दी कि हमारे साथ छेड़खानी करना कितना महंगा पड़ सकता है, ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट पूरा बर्बाद हो गया तपोवन एनटीपीसी के हाइडल पावर के कुछ अवशेष  ही शेष बचे हुए हें इसी अलख नन्दा नदी के नीचे  की ओर पीपलकोटी परियोजना भी है  एनटीपीसी यंहा भी  हाइडल पावर बन रहा था उसको भी भारी नुकसान हुआ |

              आमतौर पर यह माना जाता है कि यदि ग्लेशियर के आसपास  सेवन रिएक्टर स्केल से अधिक का  भूकंप आता है तो ही ग्लेशियर में टूट-फूट की गुंजाइश बनती है , ग्लेशियर की खासियत होती है उससे  गिरने वाले पानी से कई छोटी-छोटी नदियां निकलकर किसी बड़ी नदी में मिलती हैं गंगा मैं भी इस तरह की सैकड़ों नदियां आकर मिलती है , फिर वह एक बड़ी नदी गंगा  का रूप लेकर बहती है ग्लेशियर से  अचानक पानी  का रिसाव बंद हो जाना  एक बड़े  खतरनाक का  संकेत  है वह बहता हुआ पानी  कहां जाकर इकट्ठा हो रहा है  समय रहते उसे नहीं देखा गया तो उसके परिणाम 2013 में ऋषिकेश और ताजे  चमोली मैं नंदा देवी ग्लेशियर  के फटने जैसे सामने आते हैं |

              एनटीपीसी मूलभूत रूप से तो थर्मल पावर जनरेशन की बड़ी कंपनी के नाम से जानी जाती है लेकिन अभी हाल ही के वर्षों में उसकी रूचि र्थमल को छोड़कर हाइडल पावर प्रोजेक्ट के रूप में सामने आई कंपनी  ने पहली बार लगभग दो दशक पहले हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में सतलुज नदी पर स्थित कोल्डम हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट के माध्यम से इस क्षेत्र में प्रवेश किया था।पिछले साल मार्च में, एनटीपीसी ने दो-सरकारी स्वामित्व वाली फर्मों - टीएचडीसी इंडिया और नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NEEPCO) में पूरी सरकारी हिस्सेदारी खरीदी थी। दोनों मुख्य रूप से पनबिजली उत्पादन में फर्म हैं। उनके अधिग्रहण ने एनटीपीसी के पोर्टफोलियो में निम्नलिखित पनबिजली परियोजनाओं - टीएचडीसी की विष्णुगाड पीपलकोटी परियोजना और टिहरी पंप भंडारण संयंत्र और नेप्को के कामेंग परियोजना को जोड़ा। पीपलकोटी परियोजना के भी बाढ़ में कुछ नुकसान होने की सूचना है।

                   एनटीपीसी के लिए गैर-कोयला बिजली उत्पादन कितना महत्वपूर्ण  क्यों हैएनटीपीसी का लक्ष्य 2032 तक 130 गीगावाट क्षमता वाली फर्म बनना है। यह परिकल्पना करता है कि इस क्षमता का 65 प्रतिशत से अधिक कोयला आधारित बिजली उत्पादन के माध्यम से होगा, शेष 35 प्रतिशत अन्य स्रोतों जैसे हाइड्रो, सोलर, न्यूक्लियर से आएंगे। और गैस। यह परिकल्पना करता है कि जलविद्युत का हिस्सा 3.8 प्रतिशत होगा, सौर का 23.2 प्रतिशत और गैस का योगदान 4.6 प्रतिशत होगा।

 

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