किसान कानून पर विशेष ....
********सरकार को खाद्यान्न खरीदने और खुदरा बाजार में बेचने की कीमत पर नियंत्रण रखना चाहिए इसके लिए कानून बनना अति आवश्यक है नहीं तो पेट्रोलियम पदार्थ की तरह गेहूं को भी ₹200 किलो भविष्य में बिकता दिखाई देगा ******
जिस तरीके से एक तरफा
कानून में संशोधन करके मोदी सरकार ने खाद्यान्नों को व्यापारी, बड़े व्यापारी और
कॉर्पोरेट के हाथों में सौंप दिया है ,इसके दुष्परिणाम का खामियाजा अंततः कंजूमर
को ही भुगतना पड़ेगा एमएसपी को लेकर सरकार ने जैसा कि मन बनाया है कि वह किसानों
की इस मांग पर भी कानून बना देगी लेकिन खुदरा व्यापारी, व्यापारी बड़े ,व्यापारी
और कॉर्पोरेट घराना एमएसपी पर तो किसानों
की फसल खरीद ही लेगा लेकिन फसल खरीदने के
बाद जब वह अपने कोल्ड स्टोरेज और गोदामों में इस अनाज को बंद करके रख लेगा तो पूरे
देश में मांग और पूर्ति का एक संकट खड़ा होगा उस वक्त यही व्यापारी और कॉर्पोरेट
घराने के लोग मनमानी कीमत पर भारत के नागरिकों को खाद्यान्न उपलब्ध कराएंगे कहने
का मतलब है कि इस बिल का अंतिम घातक परिणाम कंजूमर की जेब पर पढ़ना वाला है उपभोक्ता एमएसपी पर खरीदे गए ₹20 किलो के गेहूं को ₹200 किलो खरीदने के लिए मजबूर होगा मोदी सरकार
को इसे समझना चाहिए कि यह उसी तरीके से घातक है जिस
तरीके से जब तक पेट्रोलियम पदार्थ सरकार के नियंत्रण में थे तब तक ₹40 -- ₹50 के आसपास डीजल, पेट्रोल के दम रहते थे लेकिन जब से सरकार के नियंत्रण से पेट्रोलियम
पदार्थ मुक्त हुए हैं 15 पैसे एक रुपए दो रुपए बढ़ते बढ़ते आज दम
₹90 के आसपास पहुंच गए हैं इसका सीधा असर
कंजूमर पर पड़ रहा है बेचारा कंजूमर कहां जाए किससे शिकायत करें कि कोई सुनवाई
नहीं है
पेट्रोलियम पदार्थ के मूल्य को नियंत्रण करने के लिए पेट्रोलियम
कंपनियों के साथ-साथ भारत के इकलौते शेख मुकेश अंबानी ने भी अपने कूट रचित दिमाग
से सरकार को यह समझाएगा की क्रूड आयल की कीमतें बढ़ती और घटती रहती हैं जिसके कारण पेट्रोलियम
पदार्थों को कंस्यूमर तक बेचने के लिए अलग-अलग मूल्य आते रहते हैं अभी तक सरकार के
नियंत्रण में होने के कारण क्रूड आयल की बढ़ी हुई कीमतों के चलते पेट्रोलियम
कंपनियों को उनके मुनाफे में घाटा होता है
इस सब के पीछे यह दिमाग था इकलौते शेख मुकेश अंबानी का , जैसे ही रिलायंस
ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज ने बड़ौदा की रिफाइनरी को अपने अधिपत्य में लिया और उसी के
बेस पर गोदावरी बेसन मैं क्रूड आयल खोजने के लिए पट्टा
हासिल किया तब से अंबानी के खुराफाती दिमाग में यह चल रहा था की सरकारी नियंत्रण से पेट्रोलियम पदार्थ को केसे
अलग किया जाये अम्बानी ने अपना पेट्रोल बेचने के लिए आउटलेट खोले थे उस वक्त पेट्रोलियम पदार्थ सरकारी नियंत्रण में होने के
कारण बुरी तरीके से फेल हो गए थे यह एक सेट बैक था
रिलायंस इंडस्ट्रीज के लिए वह इससे उभरना भी चाहती थी , आम जनता को अच्छी तरह से याद है कि
रिलायंस ने पूरे देश में पेट्रोल बेचने के
लिए अपने आउटलेट खोले थे उस वक्त पेट्रोलियम पदार्थ सरकारी नियंत्रण में थे
रिलायंस के आउटलेट पेट्रोल पंप 95% से अधिक बंद हो गए थे तभी से मुकेश
अंबानी और उनकी कंपनी के बड़े कॉर्पोरेट एक्सपर्ट लगातार सरकार का पीछा कर रहे थे
किकिस तरीके से पेट्रोलियम पदार्थ को
सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाए जिसको लेकर उन्होंने तरह-तरह के आंकड़े भी
प्रस्तुत किए सरकार पर तमाम तरीके के दबाव बनाए गए और अंततः सरकार ने पेट्रोलियम
पदार्थ को सरकार के नियंत्रण से मुक्त कर दिया उसका परिणाम आज यह है की आम उपभोक्ता
को ₹90 लीटर पर पेट्रोल डीजल खरीदना पड़ रहा है जबकि ना तो उस की तनखाह बढ़ी
है और ना ही व्यापार में उस अनुमान का प्रॉफिट बढ़ा हे
इस तरीके के निर्णय का सीधा असर कंजूमर में पड़ता है जिसमें सबसे
अधिक परेशानी मध्यम वर्गीय कंजूमर को होती है अपर क्लास को तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मिडिल क्लास के लोगों की कमर टूट
जाती है और पेट्रोलियम कमर तोड़ भी रहा है क्योंकि कानून बन चुका हे अंबानी और इंडियन ऑयल कंपनियों की
बल्ले-बल्ले है उपभोक्ता पेट्रोलियम पदार्थ से लेकर रसोईघर तक सिर्फ चिल्ला ही रहा
है और कुछ नहीं कर रहा कल्ला आ रहा है वह कहां जाए और क्या करें समझ से परे
है
इसी तरीके से जो भी है जब यह किसान कानून पूरे देश में लागू हो जाएगा इसके
दुष्परिणाम सामने आना शुरू होंगे सबसे अधिक परेशानी और महंगाई की मार मध्यम वर्ग के उपभोक्ता को होगी सुनवाई के सभी दरवाजे कानून
बनते ही बंद हो जाएंगे कारपोरेट और व्यापारी मनमानी कीमत पर आम उपभोक्ता को
खाद्यान्न उपलब्ध कराएंगे मजबूरी में उपभोक्ता खरीदेगा जिंदा रहेगा इस कानून को
पूरी तरीके से रद्द होना चाहिए जल्दबाजी में एक तरफ बनाए गए कानून की खिलाफत
किसानों के साथ साथ आम उपभोक्ता को भी करना चाहिए क्योंकि अंत में जेब उसी की कटने वाली है इसलिए सरकार को चाहिए की खाद्यान्न खरीदने की कीमत और खुदरा बाजार में बेचने की कीमत का नियंत्रण अपने पास
रखना चाहिए नहीं तो पेट्रोलियम पदार्थ के तरह ही खाद्य पदार्थ पर कॉर्पोरेट जगत अपना आधिपत्य जमा कर अर्थव्यवस्था
को चौपट कर देगा जनता त्राहिमाम त्राहिमाम करती दिखाई देगी




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