दीपावली अथवा दीवाली (संस्कृत: दीपावलिः, उत्तरी गोलार्ध की शरद् ऋतु में प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला एक पौराणिक उत्सव है। यह कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है और भारत के सबसे बड़े और सर्वाधिक महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। आध्यात्मिक रूप से यह 'अन्धकार पर प्रकाश की विजय' को दर्शाता है।
दिसम्बर २०२५ में यूनेस्को ने दीपावली को अपनी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कर लिया है।
श्री गणेश-लक्ष्मी पूजा
दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों 'दीप' अर्थात 'दिया' व 'आवली' अर्थात 'लाइन' या 'श्रृंखला' के मिश्रण से हुई है। इस उत्सव में घरों के द्वारों, घरों व मंदिरों पर लाखों प्रकाशकों को प्रज्वलित किया जाता है।
दीपावली, जिसे दिवाली भी कहा जाता है, विभिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न नामों से जानी जाती है, जैसे:
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भारत में प्राचीन काल से दीपावली को विक्रम संवत् के कार्तिक माह में ग्रीष्म की फ़सल के बाद के एक त्योहार के रूप में दर्शाया गया।
पद्म पुराण और स्कन्द पुराण में दीपावली का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि ये ग्रन्थ पहली सहस्त्राब्दी के दूसरे भाग में किन्हीं केंद्रीय पाठ को विस्तृत कर लिखे गए थे। दीये (दीपक) को स्कन्द पुराण में सूर्य के हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाला माना गया है, सूर्य जो जीवन के लिए प्रकाश और ऊर्जा का लौकिक दाता है और जो हिन्दू कैलंडर अनुसार कार्तिक माह में अपनी स्तिथि बदलता है।
कुछ क्षेत्रों में हिन्दू दीपावली को यम और नचिकेता की कथा के साथ भी जोड़ते हैं। नचिकेता की कथा जो सही बनाम गलत, ज्ञान बनाम अज्ञान, सच्चा धन बनाम क्षणिक धन आदि के बारे में बताती है; पहली सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व उपनिषद में लिखित है।

दिपावली का इतिहास रामायण से भी जुड़ा हुआ है, ऐसा माना जाता है कि श्री राम चन्द्र जी ने माता सीता को रावण की कैद से छुड़ाया तथा उनकी अग्नि परीक्षा के उपरान्त, १४ वर्ष का वनवास व्यतीत कर अयोध्या वापस लोटे थे। अयोध्या वासियों ने श्री राम चन्द्र जी, माता सीता, तथा अनुज लक्षमण के स्वागत हेतु सम्पूर्ण अयोध्या को दीप जलाकर रोशन किया था, तभी से दीपावली अर्थात दीपों का त्यौहार मनाया जाता है।
७वीं शताब्दी के संस्कृत नाटक नागनंद में राजा हर्ष ने इसे दीपप्रतिपादुत्सवः कहा है जिसमें दीये जलाये जाते थे और नव वर-बधू को उपहार दिए जाते थे।
९ वीं शताब्दी में राजशेखर ने काव्यमीमांसा में इसे दीपमालिका कहा है जिसमें घरों की पुताई की जाती थी और तेल के दीयों से रात में घरों, सड़कों और बाजारों सजाया जाता था।
फ़ारसी यात्री और इतिहासकार अल बेरुनी, ने भारत पर अपने ११ वीं सदी के संस्मरण में, दीपावली को कार्तिक महीने में नये चन्द्रमा के दिन पर हिन्दुओं द्वारा मनाया जाने वाला त्यौहार कहा है।
महत्त्व
भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी पर्वों में दीपावली का व्यवहारिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टियों से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात अन्धकार की ओर नही, प्रकाश की ओर जाओ। यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं तथा सिख समुदाय इसे बन्दी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है।
सूर्य के भूमध्य रेखा के दक्षिण की ओर प्रस्थान करने पर शरद ऋतु की पहली अमावस्या होने के कारण कार्तिक मास की अमावस्या की रात बहुत अंधेरी व ठंडी होती है, जिसे रोशन व ऊष्मा युक्त करने के लिए दीपक जलाए जाते हैं।
विलियम सिम्पसन ने अपनी १८६७ की क्रोमोलिथोग्राफ़ को "दीवाली, दीपों का पर्व" शीर्षक दिया था। इसमें संध्या समय प्रकाशित गलियों का दृश्य था, जहाँ एक लड़की और उसकी माँ सड़क के कोने पर दीपक जला रही थीं।
स्वच्छता
दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी स्वच्छ कर सजाते हैं। बाजारों में गलियों को भी स्वर्णिम झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाजार सब स्वच्छ और सजे दिखते हैं।




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