नरेन्द्र कुमार वर्मा (दिव्यदूत, ब्यूरो चीफ नई दिल्ली)
नई दिल्ली ///भारत में लेग अटैक का खतरा बढ़ता जा रहा है। पैरों की नसों में अचानक खून के थक्के का जम जाना या ब्लाकेज होने से लोगों में लेग अटैक का संकट बढ़ जाता है। लंबे समय तक एक स्थान पर बैठ कर कार्य करने से पैरों में ऑक्सीजन और खून का प्रवाह रुक जाता है। जिसके कारण मांसपेशियां खराब होने लगती है। वैस्कुलर सोसाइटी ऑफ़ इंडिया ने कहा है कि यह बीमारी भारत जैसे देश में तेजी से पैर पसार रहा है। अगर भविष्य में इस बीमारी पर कंट्रोल पाना है तो सरकार को देश के सभी मेडिकल कॉलेजों और बड़े चिकित्सा संस्थानों में वैस्कुलर डिपार्टमेंट का गठन करना होगा ताकि देश में अधिक से अधिक वैस्कुलर स्पेशलिस्ट बन सकें।
वैस्कुलर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जिस तरह से देश में ऑनलाइन गेमिंग, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर शो देखने, ऑनलाइन पढ़ाई और लंबे समय तक कंप्यूटर के इस्तेमाल के दौरान युवा घंटों बैठे रहते है। उसके कारण पैरों की हलचल और नसों में खून का बहाव कम हो सकता है। जिससे युवाओं में डीप वेन थ्रोम्बोसिस जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। दिल्ली में वैस्कुलर सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के आव्हान पर दुनिया भर के वैस्कुलर विशेषज्ञों ने दो दिनों तक इस गंभीर बीमारी पर मंथन किया और इससे जुड़े शोध एवं उपचार के बारे में लोगों को बताया। इस कार्यक्रम में वैस्कुलर और एंडोवैस्कुलर सर्जरी में हुई प्रगति और नई चुनौतियों पर चर्चा करने के लिए भारत सहित दुनियाभर से 400 से ज़्यादा फैकल्टी सदस्य और 1,000 से चिकित्सा जगत के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

परिचर्चा में डॉक्टरों ने कहा कि देश में जैसे ब्रेन अटैक, हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, मधुमेय की समस्या बढ़ रही है वैसे ही आने वाले दिनों में देश की युवा आबादी के लिए लेग अटैक भी एक बड़ी चिंता का विषय हो सकता है। इस परिचर्चा में विशेषज्ञों ने कहा कि लाइफ स्टाइल में सुधार, व्यायाम, नियमित खानपान, तंबाकू को अपनी जीवनशैली से अलग करना जैसी आदतों को अपना कर वैस्कुलर की बीमारियों से बचा जा सकता है।
वैस्कुलर विशेषज्ञों ने बताया कि डीप वेन थ्रॉम्बोसिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की गहरी नसों में खास तौर पर पैरों में खून का थक्का जम जाता है जो खून के सामान्य बहाव रोक सकता है। सही समय पर इलाज न मिलने पर यह थक्का फेफड़ों तक पहुँच सकता है और गंभीर रुकावट पैदा कर सकता है जिससे जान का खतरा उत्पन्न हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि हमारे रहन-सहन, काम करने के तौर-तरीके और आराम करने के तरीकों में बदलाव की वजह से ऐसा हो रहा है।
देश की राजधानी में संपन्न हुई इस दो दिन की वैस्कुलर कार्यशाला में साइंटिफिक रिपोर्ट्स 2024 में प्रकाशित एक बड़े सिस्टेमैटिक रिव्यू और डोज़-रिस्पॉन्स मेटा-एनालिसिस का भी गहन अध्ययन किया गया। जिसमें पाया गया कि बैठे रहने की आदत सबसे ज़्यादा थी। उनमें वीनस थ्रोम्बोएम्बोलिज़्म का जोखिम उन लोगों की तुलना में लगभग 24% ज़्यादा था जिनमें यह आदत सबसे कम थी। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि दिन भर में बैठे रहने की आदत में हर एक घंटे की बढ़ोतरी के साथ वीनस थ्रोम्बोएम्बोलिज़्म का जोखिम 2% बढ़ जाता है।
इस अवसर पर वैस्कुलर सोसाइटी ऑफ़ इंडिया सेक्रेटरी डॉ. तापिश साहू ने कहा हमारी ओपीडी में ऐसे युवा मरीज़ों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो पैरौं का मांसपेशियों से पीड़ित है। लगातार पांच या छह घंटे बैठ कर काम करने से पैर की पिंडलियों की मांसपेशियां के खून को पंप करने का काम बहुत कम हो पाता है। किशोर तबके के लंबे समय तक डिजिटल डिवाइस के इस्तेमाल पर की गई रिसर्च में भी इस बढ़ती चिंता को उजागर किया गया है। इस रिचर्स में किशोरों में 8 के पैरों में डीप वेन थ्रॉम्बोसिस, 2 के अंदर पल्मोनरी एम्बोलिज्म और 1 किशोर को सबक्लेवियन-वेन थ्रॉम्बोसिस की समस्या थी।
परिर्चचा में वैस्कुलर सोसाइटी ऑफ इंडिया के चेयरमैन डॉ. तरुण ग्रोवर ने कहा कि अलग-अलग तरीकों से वैस्कुलर जोखिम बढ़ सकता हैं। इसमें धूम्रपान एक बड़ा जोखिम है जो रक्त वाहिकाओं पर बुरा असर डाल सकता है और थ्रॉम्बोसिस से जुड़ी स्थितियों को बढ़ावा देता है। डॉ तरुण ने कहा कि भारत के सभी मेडिकल चिकित्सालयों के पाठ्यक्रम में वैस्कुलर जैसी गंभीर बीमारी को शामिल किया जाए। उन्होंने कहा कि देश के सभी बड़े चिकित्सा संस्थानों सहित मेडिकल कॉलेजों में वैस्कुलर डिपार्टमेंट का गठन होना चाहिए ताकि देश में ज्यादा से ज्यादा वैस्कुलर चिकित्सक खड़े हो सके औ…




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