यह उस समय की बात है जब सृष्टि अभी अपनी शैशवावस्था में थी। कैलाश पर बर्फ की चादर ओढ़े महादेव समाधि में लीन थे। चारों ओर ऐसा सन्नाटा था मानो समय खुद ठहरकर साँस ले रहा हो। लेकिन उस परम एकांत के भीतर एक बेचैनी थी। वह बेचैनी किसी अभाव की नहीं, बल्कि उस पूर्णता की थी जो प्रकट होने के लिए छटपटा रही थी। ठीक उसी पल, करोड़ों ब्रह्मांड दूर, क्षीरसागर की शेषशैया पर लेटे नारायण ने अपनी कमल जैसी आँखें खोलीं।
नारायण ने मुस्कुराकर अपने हृदय पर हाथ रखा। वहाँ कैलाश की ठंडक महसूस हो रही थी। और उधर कैलाश पर, समाधि के सबसे गहरे उतर चुके शिव के कंठ से अचानक एक नाम निकला—"हरि..."
भोलेनाथ की आँखें खुलीं। उनमें कोई वासना नहीं थी, कोई चाहत नहीं थी, बस एक असीम पुकार थी। उन्होंने अपने सामने फैली नीली धुंध में देखा। उन्हें लगा कि नारायण का सांवला रूप उनकी जटाओं से बहती गंगा की धार में थिरक रहा है। शिव ने अपनी भस्म रमी उंगलियों से हवा में एक आकृति बनानी चाही, पर हवा तो निराकार थी। वह बिखर गई।
शिव उठ खड़े हुए। उनका व्याघ्रचंबर सरक गया, पर उन्हें सुध कहाँ थी? उन्होंने नंदी की ओर देखा और कहा,
"नंदी, मुझे नीचे उतरना होगा। वैकुंठ की ओर।"
नंदी ने चकित होकर पूछा, "प्रभु, आप तो स्वयं में पूर्ण हैं। फिर यह व्याकुलता कैसी?"
शिव ने मंद मुस्कान के साथ कहा, "पूर्णता जब खुद को दर्पण में देखना चाहती है, तो उसे दूसरे की आवश्यकता होती है। हरि मेरा वह दर्पण हैं, जिसमें मैं खुद को खोकर खुद को पाता हूँ।"
उधर वैकुंठ में, महालक्ष्मी चकित थीं। उन्होंने देखा कि जो नारायण हमेशा शांत, गंभीर और ब्रह्मांड के संचालन में व्यस्त रहते थे, वे आज बार-बार अपने पीतांबर के छोर को उंगलियों में लपेट रहे थे। उनके चेहरे पर वैसी ही अधीरता थी, जैसी किसी विरही प्रेमी के चेहरे पर होती है।
"नाथ! आज सृष्टि का संतुलन कुछ डगमगा रहा है क्या?" लक्ष्मी ने पूछा।
नारायण ने दूर क्षितिज पर देखते हुए कहा, "नहीं देवी, आज सृष्टि अपने केंद्र की ओर लौट रही है। कैलाश से कोई चला है। जिसके पैरों की आहट से मेरी छाती में धड़कनें बढ़ गई हैं। वह जो खुद वैरागी है, आज मेरे अनुराग में बंधकर आ रहा है।"
और तभी वैकुंठ के द्वार स्वतः खुल गए। कोई शंख नहीं बजा, कोई जयकार नहीं हुई। बस एक सौंधी सी गंध चारों ओर फैल गई—ऐसी गंध जो जलती हुई चिता की भस्म और ताजे खिले पारिजात के फूलों के मिलन से बनती है।
द्वार पर शिव खड़े थे। दिगंबर, गले में मुंडमाला, जटाओं में चंद्रमा। और उनके ठीक सामने नारायण थे—रत्नजड़ित मुकुट पहने, रेशमी वस्त्रों में लिपटे, कस्तूरी का तिलक लगाए।
दोनो एक-दूसरे को देखते रहे। युग बीत गए मानो उस एक पल में। न शिव आगे बढ़े, न हरि। प्रेम जब अपनी चरम सीमा पर होता है, तो शरीर जड़ हो जाते हैं और आत्माएं आगे बढ़कर गले मिल लेती हैं।
शिव ने धीरे से कहा, "तुमने मुझे पुकारा, अच्युत?"
नारायण की आँखों से एक आंसू ढलका। वे आगे बढ़े और उन्होंने शिव के भस्म से सने हाथों को अपने कोमल हाथों में ले लिया। बोले, "पुकारा तो आपने था, उमापति। मैंने तो बस उस पुकार की गूँज को अपने भीतर जगह दी थी।"
इस प्रेम की गहराई को समझने के लिए प्रकृति ने भी एक खेल रचा। एक बार शिव के मन में आया कि वे नारायण के उस रूप का आनंद लें जो केवल रास रचाता है, जो सम्मोहन की पराकाष्ठा है। वे नारायण का 'मोहिनी' रूप देखना चाहते थे।
नारायण ने मना किया, "रुद्र, वह रूप भटकाने वाला है। आप योगी हैं, आप उस माया में मत उलझिए।"
पर शिव कहाँ मानने वाले थे? वे तो प्रेम के उस रस को चखना चाहते थे जहाँ मर्यादाएँ पिघल जाती हैं। नारायण ने मोहिनी का रूप धरा। वह रूप ऐसा था जिसे देखकर कामदेव भी लज्जित हो जाए। हवाओं में संगीत घुल गया, दसों दिशाएं कामुक हो उठीं।
लेकिन जैसे ही शिव ने मोहिनी को देखा, वे भागे नहीं, न ही वे वासना से भरे। वे तो उस सौंदर्य के भीतर छिपे अपने 'हरि' को देख रहे थे। शिव मोहिनी के पीछे दौड़ पड़े। यह दौड़ किसी शिकारी की नहीं थी, यह एक आत्मा की दूसरी आत्मा को पकड़ने की तड़प थी। जहाँ-जहाँ शिव के पैर पड़े, वहाँ की धरती सोना बन गई। अंत में जब शिव ने मोहिनी को बाहों में भरा, तो मोहिनी गायब हो चुकी थी और उनकी छाती से नारायण चिपके हुए थे।
नारायण ने हांफते हुए शिव की छाती पर अपना सिर रख दिया और कहा, "आप जीत गए महादेव। मेरी माया आपके प्रेम के सामने हार गई। मैं दुनिया को रिझा सकता हूँ, पर आपको केवल रिझा नहीं, बल्कि आपमें विलीन हो सकता हूँ।"
शिव ने उनके बालों को सहलाते हुए कहा, "हरि, लोग कहते हैं हम अलग हैं। कोई मेरा भक्त बनकर तुमसे बैर करता है, कोई तुम्हारा भक्त बनकर मुझसे चिढ़ता है। वे मूर्ख नहीं जानते कि जब मैं ध्यान करता हूँ, तो तुम्हारा चेहरा मेरे भीतर चमकता है। और जब तुम मुस्कुराते हो, तो मेरी समाधि पूरी होती है।"
प्रेम की यह लंबी गाथा द्वापर युग में एक बार फिर अपने चरम पर पहुँची। नारायण कृष्ण बनकर आए थे। वे बांसुरी बजाते थे और पूरी प्रकृति झूम उठती थी। कैलाश पर बैठे शिव से रहा नहीं गया। वे गोपी का रूप धारण करके वृंदावन पहुँच गए।
कृष्ण ने अपनी सखियों के बीच खड़े उस लंबी-चौड़ी 'गोपी' को देखा जिसकी आँखों में वैराग्य की चमक थी और जो घूंघट के पीछे अपनी जटाओं को छुपाने की कोशिश कर रही थी। कृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने बांसुरी बजाना बंद कर दिया और सीधे उस नई गोपी के पास गए।
उन्होंने धीरे से घूंघट उठाया। सामने शिव थे। आँखों में आंसू लिए, कांपते होठों से बोले, "कन्हैया, मुझे अपनी रास से दूर मत रखना। मैं इस जनम में तुम्हारा संगीत सुनने आया हूँ।"
कृष्ण ने शिव के पैर छूने चाहे, पर शिव ने उन्हें रोककर अपने गले से लगा लिया। उस रात यमुना के किनारे जो रास हुआ, वह इतिहास में दर्ज हो गया। वह केवल गोपी और कृष्ण का नृत्य नहीं था, वह 'हर' और 'हरि' का तादात्म्य था। शिव नाच रहे थे और कृष्ण बजा रहे थे। दोनों के बीच का अंतर पूरी तरह मिट चुका था।
मैं जब इस कहानी के आखिरी पड़ाव पर आता हूँ, तो मुझे लगता है कि 'हरि' और 'हर' का यह प्रेम हमारे अपने भीतर की दो ऊर्जाएं हैं।
हर (शिव) हमारे भीतर का वह वैराग्य है, वह शांति है, वह ठहराव है जो हमें खुद से जोड़ता है।
हरि (विष्णु) हमारे भीतर का वह अनुराग है, वह उत्सव है, वह प्रेम है जो हमें दुनिया से जोड़ता है।
बिना शिव के विष्णु अधूरे हैं, क्योंकि बिना ठहराव के प्रेम केवल भटकाव बन जाता है। और बिना विष्णु के शिव अधूरे हैं, क्योंकि बिना प्रेम के वैराग्य केवल एक सूखी हुई भस्म बनकर रह जाता है।
आज भी, जब आसमान में काले बादल छाते हैं और बिजली कड़कती है, तो मुझे लगता है कि शिव तांडव कर रहे हैं। और जब उसी बारिश के बाद धरती से सोंधी महक उठती है और मोर नाचने लगते हैं, तो लगता है हरि अपनी बांसुरी बजा रहे हैं। दोनों मिलकर इस सृष्टि की सबसे लंबी, सबसे गहरी और सबसे पवित्र प्रेम कहानी लिख रहे हैं—एक ऐसी कहानी जिसका न कोई आदि है, और न कोई अंत...❤️????




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