एक बार गौ लोक धाम में कृष्णप्रिया राधा जी ने श्री गोविन्द से पुछा..
हे माधव !
कंस आपका सगा मामा होते हुए भी आपके माता पिता को घोर पीड़ा देता,
निरंतर आपका अपमान करता,
आपका संतों का मज़ाक उड़ाता,
आपको मार देने के प्रयास करता,
कभी किसी को भेजता कभी किसी को, हत्या के प्रयत्न करता रहता
फिर भी उस महापापी के ऐसे कौन से पुण्य थे की उसे आपके हाथों मृत्यु यानि परम मोक्ष प्राप्त हुआ..... ??
तो मोहन ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि
राधे! कंस कुछ भी करता।
कुछ सोचता तो मेरे ही बारे में चाहे द्वेष और क्रोध अथवा भय के कारण, परन्तु मेरा स्मरण उसे हर पल रहता था, और जो व्यक्ति हर वक्त मेरा सुमिरण करेगा उसे में मोक्ष ही दूंगा चाहे वो मेरा विरोधी ही क्यों न हो।
इसलिए श्रीमद्भगवत के अंत में एक सबसे मत्वपूर्ण श्लोक आता है।
नाम संकीर्तनं यस्य सर्व पाप प्रणाशनम् ।
प्रणामो दुःख शमनः तं नमामि हरिं परम् ॥
(मैं उन 'हरि' को प्रणाम करता हूँ जिनका नाम संकीर्तन सभी पापों को समाप्त करता है और जिन्हें प्रणाम करने मात्र से सारे दुःखों का नाश हो जाता है। )
...???? श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा ????????




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