वो हर सुबह अपने आंगन को संवारती थीं,
हर सांझ तुलसी के चौरे पर दीप जलाती थीं,
हर रात वही बाँसुरी की धुन सुनती थीं...
जो अब केवल उनकी स्मृतियों में बची थी।
???? कथा यहीं से शुरू होती है—जहाँ प्रेम मौन हो जाता है, पर समर्पण बोलने लगता है।
वृंदावन छोड़कर जब कृष्ण मथुरा और फिर द्वारका चले गए,
तो राधा का नाम जैसे धर्मग्रंथों से भी विलुप्त हो गया।
लेकिन कुछ संतों, ग्रंथों और लोकश्रुतियों में
एक कथा अब भी साँस लेती है...
???? वर्षों बाद —
जब वृंदावन से लोग द्वारका कृष्ण से मिलने निकले,
तो वृद्ध राधा ने भी संकल्प लिया —
“मैं उसे देखने जाऊँगी, पर पूछूँगी कुछ नहीं।”
रास्ते भर सोचती रहीं —
कृष्ण से मिलूँगी तो क्या कहूँगी?
रोऊँगी? हँसूंगी?
उनसे पूछूँगी कि क्यों नहीं लौटे?
???? लेकिन जब द्वारका पहुँचीं...
रुक्मिणी के साथ सिंहासन पर बैठे कृष्ण को देखकर
राधा ने कुछ भी नहीं कहा।
बस वहीँ एक सेविका बन गईं — 'देविका'।
हर दिन राजमहल में कार्य करतीं,
हर क्षण कृष्ण को देखतीं,
पर कभी सामने नहीं आईं।
ये उनके प्रेम की पराकाष्ठा थी —
जिसे कहा नहीं गया, पर जिया गया।
???? फिर एक दिन...
जब शरीर जवाब देने लगा,
जब साँसें धीमी पड़ने लगीं,
राधा ने द्वारका छोड़ दी।
कृष्ण जानते थे...
कि अब मिलना अंतिम होगा।
वो स्वयं आए राधा के पास।
पूछा —
"क्या चाहती हो राधे?"
राधा मुस्कराईं। कहा — "एक आख़िरी बार वो बांसुरी बजा दो..."
और कृष्ण ने बाँसुरी उठाई।
धुन वही थी, वृंदावन वाली...
हर स्वर में वो मिलन था जो कभी हुआ ही नहीं,
हर ताल में वो विरह था जो कभी ख़त्म ही नहीं हुआ।
बाँसुरी बजती रही... और राधा, कृष्ण में लीन हो गईं।
कृष्ण ने बाँसुरी तोड़ी।
उसे यमुना में बहा दिया।
और प्रण किया — "अब जीवन भर बाँसुरी नहीं बजाऊँगा..."
????एक प्रेयसी थी, मौन थी... फिर भी कहती सब कुछ थी,
एक प्रेमी था, राजमहल में था... पर उसकी आँखें अब भी वृंदावन खोजती थीं।
और बाँसुरी...?
वो तो अब भी बजती है — हर उस दिल में जहाँ राधा चुपचाप बैठी है।
????एक सवाल आपसे —
क्या आपने भी किसी को यूँ प्रेम किया है,
कि सवाल नहीं पूछे,
बस चुपचाप उनके लिए सब कुछ सह लिया?
अगर हाँ...
तो ये पोस्ट उनके नाम,
जिनसे हमेशा प्रेम रहा,
पर शायद कभी कह नहीं पाए।




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