दिव्य-दूत

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भगवान कृष्ण ने कहा कि कलयुग में वह इसी रूप में अवतरित होंगे और आज जगन्नाथ पुरी में भगवान का यही रूप विग्रह मौजूद है

Anil Choubey 07-04-2026 22:48:18


एक बार माता यशोदा माता देवकी के साथ द्वारका पधारीं

वहां कृष्ण की रानियों ने माताओं से कृष्ण के बचपन की लीलाओं का वर्णन करने का अनुरोध किया। उनके साथ बहन सुभद्रा भी थीं। माता यशोदा ने कहा कि वह उन्हें कृष्ण तथा उनकी गोपियों की लीलाएं तो सुना देंगी पर ये कथा कृष्ण और बलराम के कानों तक नहीं पहुंचनी चाहिए।

सुभद्रा द्वार पर पहरा देने के लिए तैयार हो गई। माता ने लीलाओं का गान शुरू किया। भगवान की लीला का रसपान करने में सब अपनी सुध-बुध खो बैठे। सुभद्रा को भी पता नहीं चला कि कब भगवान श्री कृष्ण और बलराम वहां आ गए और उनके साथ ही कथा का आनन्द लेने लगे। बचपन की मधुर लीलाओं को सुनते सुनते उनकी आंखें फैलने लगीं। सुभद्रा की भी यही दशा हुई वह आनंदित हो कर पिघलने लगीं।

उसी समय श्री नारदजी वहां पधारे। किसी के आने का अहसास होते ही कथा रुक गई। नारदजी भगवान संग बलराम और सुभद्रा के ऐसे रूप को देखकर मोहित हो गए।वह बोले - भगवन् ! आपका यह रूप बहुत सुंदर है। आप इस रूप में सामान्य जन को भी दर्शन दें। तब भगवान कृष्ण ने कहा कि कलयुग में वह इस रूप में अवतरित होंगे। जगन्नाथ पुरी में भगवान का यही विग्रह मौजूद है जिसमें वह अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ हैं। परंतु यह विग्रह भी आधा अधूरा सा क्यों है इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है।

इस मंदिर के उद्गम से जुड़ी परंपरागत कथा के अनुसार- भगवान जगन्नाथ की इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक वृक्ष के नीचे मिली थी। यह इतनी चकाचौंध करने वाली थी, कि धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा।

मालवा नरेश इंद्रद्युम्न को स्वप्न में यही मूर्ति दिखाई दी थी। तब उसने कड़ी तपस्या की और तब भगवान विष्णु ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये और उसे एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा। उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये।

राजा ने ऐसा ही किया और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया। उसके बाद राजा को विष्णु और विश्वकर्मा बढ़ई कारीगर और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए। किंतु उन्होंने यह शर्त रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बंद रहेंगे और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये।

माह के अंतिम दिन जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी, तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झांका और वह वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया और राजा से कहा, कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे। राजा के अफसोस करने पर मूर्तिकार ने बताया कि यह सब दैववश हुआ है और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगीं। तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गईं।

 

 

 

 

 

 

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