समुद्र मंथन कहाँ हुआ था

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवताओं और असुरों द्वारा मंदराचल पर्वत और वासुकी नाग की सहायता से किए गए समुद्र मंथन से 14 अमूल्य रत्न निकले। इनमें हलाहल विष, कामधेनु, ऐरावत, उच्चैःश्रवा घोड़ा, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, रंभा, लक्ष्मी, वारुणी, चंद्रमा, पारिजात वृक्ष, पांचजन्य शंख, धन्वंतरि और अंत में अमृत कलश शामिल थे।
समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों की सूची:
4 ऐरावत हाथी (Airavat Elephant): सफेद हाथी, जिसे इंद्र ने लिया।
5 कौस्तुभ मणि (Kaustubha Mani): भगवान विष्णु ने इसे अपने हृदय पर धारण किया।
6कल्पवृक्ष (Kalpavriksha): हर इच्छा पूरी करने वाला वृक्ष, जो देवताओं को मिला।
7रंभा अप्सरा (Rambha Apsara): अप्सराओं में श्रेष्ठ, जो देवताओं के पास गई।
8देवी लक्ष्मी (Goddess Lakshmi): धन और समृद्धि की देवी, जो भगवान विष्णु की पत्नी बनीं।
9वारुणी मदिरा (Varuni Madira): मदिरा की देवी, जिसे दानवों ने ग्रहण किया।
10चंद्रमा (Moon): जिसे भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया।
11पारिजात वृक्ष (Parijat Tree): देवराज इंद्र को प्राप्त हुआ।
12पांचजन्य शंख (Panchajanya Shankha): भगवान विष्णु को समर्पित किया गया।
13भगवान धन्वंतरि (Lord Dhanvantari): आयुर्वेद के जनक, जो हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।
14 अमृत कलश (Amrit Kalash): अंतिम रत्न, जिसे भगवान विष्णु (मोहिनी रूप) ने देवताओं को पिलाया।
स्थूल दृष्टि से देखें तो शायद अरब सागर में कहीं। लेकिन ऐसा नहीं है। किसी भी घटना के सही स्थान का पता करने हेतु उस समय की भौगौलिक स्थिति का पता होना भी जरूरी है। ग्रंथों में गहरे घुसेंगे तो पता चलेगा कि बिहार, बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा आदि समुद्र मंथन के समय जलमग्न थे। उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से भी उस समय थे नहीं।
समुद्रमंथन का समय भागीरथी के प्रादुर्भाव से भी बहुत पहले का है। उस समय हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बहुत थोड़ी ही भूमि का निर्माण कर पाई थी। नदियाँ ही भूमि का निर्माण करती हैं। इस राष्ट्र के पिता पर्वत हैं तो माताएँ नदियाँ। अभी भी सबसे प्रसिद्ध डेल्टा सुंदरवन इसी निर्माण का प्रमाण है।
कथा है कि जब समुद्रमंथन की बात उठी तो मंदार पर्वत की मथानी तो बना ली गई, कूर्मावतार ने आधार भी दे दिया, लेकिन मथानी की रस्सी कहाँ से लाएँ। उस समय सर्वसम्मति बनी कि हिमालय की कंदराओं में आराम कर रहे नागराज वासुकि से ही यह काम करवाया जा सकता है। उनसे बड़ी रस्सी जैसी कोई वस्तु तीनों लोक और चौदहों भुवन में नहीं हैं।
अब समस्या थी कि उन्हें लाए कौन?
इतने बड़े थे कि लहरिया स्टाइल में रेंगते तो टकराने लगते। इसलिये अधिकतर समय आराम ही करते थे। इस पर कैलाशपति उठे और वासुकि को अपनी कलाई में लपेट कर चल दिये। नागराज की डिलीवरी करके भोले एक स्थान पर बैठ गए।
जब मंथन प्रारम्भ हुआ तो नागराज को पीड़ा होने लगी। इधर से देवता खींचें, उधर से असुर खींचें, बीच में मंदराचल चुभे। क्षुब्ध होकर नागराज से फुफकारना शुरू कर दिया। अब सोचिये कि जिस नाग को एक पर्वत के चारों तरफ लपेट दिया गया, वह कितना बड़ा होगा। नागराज के फुफकारने से समस्त सृष्टि में जहर फैलने लगा। हाहाकार मच गया।
एक तरफ तो देवता और असुर भाग खड़े हुए और दूसरी तरह नागराज निढाल होकर फुफकारते रह गए।
अब करें तो करें क्या?
देवताओं की मीटिंग बिठाई गई। प्रश्न उठा कि इस हलाहल को कौन पियेगा?
विष्णु भगवान ने भोले बाबा के चरण धर लिये कि बाबा आप ही पी सकते हैं।
जो भोले होते हैं, उनके हिस्से ही जहर आता है। बाबा उठे और पहले जहर पिया और फिर वासुकि का उपचार किया। तब तक तो धन्वंतरि निकले भी नहीं थे। उनसे भी पुराने वैद्य हैं वैद्यनाथ।
बाबा ने हलाहल पी तो लिया, लेकिन उसका ताप असह्य हो गया। वहीँ एक स्थान देखकर बैठ गए। मंथन शुरू हो गया। मंथन से निकले चन्द्रमा के एक टुकड़े को तोड़ कर निकाला गया और उसे भगवान के सर के ठीक ऊपर स्थापित किया गया। उस टुकड़े से निरंतर शीतल जल महादेव के सर पर गिरता रहता है।
यह क्षेत्र कहाँ है जहाँ मंथन हुआ था?
बिहार के बाँका जिले में स्थित मंदार पर्वत के आसपास का क्षेत्र ही मंथन का स्थान है। आज भी झारखण्ड, बंगाल, उड़ीसा और बिहार की भूमि में खनिजों का प्रचुर भण्डार है। सबका केंद्र मंदार पर्वत ही है। मंदार में अब भी समुद्र मंथन से निकली निधियाँ छिपी हुई हैं।
भोलेनाथ नागराज को पहुँचाने के बाद जिस स्थान पर बैठे थे, वह स्थान है वासुकीनाथ। जिस स्थान पर नागराज का उपचार करने व विष ग्रहण करने के बाद बैठे थे, वह स्थान है वैद्यनाथ धाम, देवघर में। चाँद का वह टुकड़ा जो उनके सर पर लगाया गया था, आज भी लगा है और उससे निरंतर जल टपकता रहता है।
वह टुकड़ा भोलेनाथ के ठीक ऊपर मंदिर के शिखर के नीचे लगा है। नाम है - चंद्रकांत मणि।




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