एक बार की कथा है, देवऋषि नारद और ऋषि अन्गरा कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनकी नजर एक मिठाई की दुकान पर पड़ी। दुकान के नजदीक ही झूठी पतलों का ढेर लगा हुआ था। उस झूठन को खाने के लिए जैसे ही एक कुत्ता आता है, बैसे ही उस दुकान का मालिक उसको जोर से डन्डा मारता है। डन्डे की मार खा कर कुत्ता चीखता हुआ वहां से चला जाता है।
ये दृश्य देख कर, देवऋषि को हंसी आ गयी। ऋषि अन्गरा ने उन से हंसी का कारण पूछा, नारद बोले: हे ऋषिवर ! यह दुकान पहले एक कन्जूस व्यक्ति की थी। अपनी जिंदगी में उसने बहुत सारा पैसा इकट्ठा किया। और इस जन्म में वो कुत्ता बन कर पैदा हुआ और यह दुकान मालिक उसी का पुत्र है, देखें ! जिस के लिए उस ने बेशुमार धन इकट्ठा किया। आज उसी के हाथों से, उसे जूठा भोजन भी नहीं मिल सका। कर्मफल के इस खेल को देखकर मुझे हंसी आ गई।
मनुष्य को अपने शुभ और अशुभ कर्मों का फल जरूर मिलता है बेशक इस लिए उसे जन्मों-जन्मों की यात्रा क्यों न करनी पड़े।
** श्री गुरु चरणम, श्री कृष्ण/शिव शरणम ***




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