दिव्य-दूत

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*परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा,पर निंदा सम अघ न गरीसा*अहिंसा यानी किसी को दुख न देना ,परम धर्म है,और हे गरुड़ जी! पर निंदा से बड़ा कोई पाप नही है।

Anil Choubey 02-01-2026 22:02:41


गरुड़ जी ने कागभुसुंडि जी से सात प्रश्न किये

1.सबसे दुर्लभ शरीर किसका है।

2.सबसे बड़ा दुख और

3.सबसे बड़ा सुख क्या है?

4.संत असंत के लक्षण क्या है,

5.कौन सा पुण्य महान है,

6. और कौन सा पाप बड़ा है?,

.7.मानस रोग क्या होते हैं?

इनके उत्तर --

काकभुसुण्डी जी ने उत्तर दिया,

*नर तन सम नहि कवनिउ देहा* मनुष्य के शरीर से उत्तम कोई शरीर नही है,क्योंकि इसी शरीर से हम ईश्वर तक को जान सकते हैं।इसलिए जो नर तन पाकर हरिभजन नही करते वे बड़े अभागे होते हैं।

*नहि दरिद्र सम दुख जग माही*

दरिद्रता सबसे बड़ा दुख है।

*संत मिलन सम सुख जग माही*

सबसे बड़ा सुख संत मिलन है।

दूसरे का उपकार ही संत का सहज स्वभाव है।

*सन इव खल पर बंधन करई*

असंत सन की तरह होते हैं। सन के बारे में आप न जानते हो तो जान लीजिए,ये एक पौधा होता है,बड़ा होने पर किसान इसे काट कर पानी मे गाड़ देता है,2 दिन बाद उसे पानी पर पीटता है,तब इससे सन निकलता है। सन की रस्सी बनती है जो किसी को भी बाध सकती है। असंत ऐसे ही होते हैं,स्वयं दुख सह कर दूसरे को कष्ट पहचानना उनका काम होता है।

*परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा,पर निंदा सम अघ न गरीसा*

अहिंसा यानी किसी को दुख न देना ,परम धर्म है,

और हे गरुड़ जी! पर निंदा से बड़ा कोई पाप नही है।

*मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला* सारे व्याधियों का मूल मोह यानी अज्ञान है।इससे बड़े सूल पैदा होते हैं।काम, क्रोध,लोभ ईर्ष्या ,तृष्णा आदि दोष मोह से उत्पन्न होते हैं जो अनेको कष्टों को पैदा करते हैं ।

ये सब मानस रोग है। ऐसी व्याधियां जो अज्ञान के कारण मन मे उत्पन्न हो वे सब मानस रोग की श्रेणी में आते हैं।

इस व्याधि की कुछ औषधि भी है जैसे *नेम धर्म आचार तप ज्ञान जग्य जप दान,भेषज पुनि कोटिन्ह नहि रोग जाहि हरिजान*

पर ये मानस रोग इनसे जाता नही है,फिर! *राम कृपा नसाहि सब रोगा*

एक ही दवा है रामजी की कृपा ,और वो कैसे हो? श्री रामचरित मानस के पढ़ने और फिर मनन करने ,इसकी सीखो को जीवन मे ढारने से ,मनुष्य मानस रोगों को पार कर शांति को प्राप्त होता है।

काक जी कहते हैं पूर्व जन्मों में मैं भी तो मानस रोग से पीड़ित था,पर जब शिव जी की कृपा से रामभक्ति मिली तब से शांति है।

मित्रो हमे भी नित सत्संग करना चाहिए। मानस की सीखो का आचरण करना चाहिए।

निश्चित ही शांति मिलेगी।

श्री शिवाय नमस्तुभयम आपका दिन मंगलमय हो

जय जय सियाराम

कागभुषंडी

कौवे के रूप मे दिखने वाले कागभुषंडी प्रभु श्रीराम के बहुत बडे भक्त थे और इन्हे ये वरदान प्राप्त था कि वो समय और टाइम के बाहर जा सकते थे यानि कि पूर्व मे क्या घटित हुआ और भविष्य मे क्या घटित होगा वो सब देख सकते थे वो समय और टाइम के बनने बिगडने की साइकल को देख सकते थे

इसलिए उन्होंने महाभारत 11 बार और रामायण 16 बार देखा था वो भी बाल्मिकि जी द्वारा रामायण और वेदव्यास जी द्वारा महाभारत लिखे जाने से पहले क्योकि ये अपने पूर्व जन्म मे कौवा थे और सबसे पहले राम कथा भगवान शंकर ने माता पार्वती जी को सुनाया था तो इन्होने भी सुन लिया था और मरने के बाद दूसरा जन्म इनका अयोध्यापुरी मे एक शूद्र परिवार मे हुआ था ये परम शिव भक्त थे लेकिन अभिमान वश अन्य देवताओं का उपहास उडाते थे इसी बात से क्षुब्ध होकर लोमष ऋषि ने इन्हे श्राप दे दिया था जिससे ये फिर कौवा बन गये थे और इसके बाद इन्होने पूरा जीवन कौवे के रूप मे ही जिया

जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम से युद्ध करते हुए भगवान श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था तब देवर्षि नारद के कहने पर गिद्धराज गरूड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर भगवान श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया था भगवान श्रीराम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरूड़ को संदेह हो गया गरूड़ का संदेह दूर करने के लिए देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्माजी के पास भेज देते हैं ब्रह्माजी उनको शंकरजी के पास भेज देते हैं भगवान शंकर ने भी गरूड़ को उनका संदेह मिटाने के लिए कागभुषंडी जी के पास भेज दिया अंत में कागभुषंडी जी ने भगवान श्रीराम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरूड़ के संदेह को दूर किया था

 

 

 

 

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