नरेन्द्र कुमार वर्मा
दिव्यदूत, ब्यूरोचीफ, नई दिल्ली
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नई दिल्ली 04/04/2025// अक्टूबर 2025 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 100 वर्षों का सफर पूरा हो जाएगा। संघ एक शताब्दी के सफर को पूरा करने के बाद अपनी विचारधारा के साथ आग बढ़ता जा रहा है। इन सौ वर्षों के सफर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने कभी अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया। बहुत सारे संघर्ष, आघात, दुश्वारियों और मिथ्या आरोपों के बाद संघ अपनी हिंदुत्व से लबालब लबरेज विचारधारा के साथ आगे बढ़ता जा रहा। संघ की विचारधारा ही संघ की शक्ति है। संघ की विचारधारा भारतवर्ष में हिंदु गौरव को पुनः स्थापित करने और प्राचीन अखंड़ भारत के सपने को पूर्ण करने वाली है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ 1925 में एक छोटे से आकार के रुप में आरंभ हुआ था। आज संघ दुनिया का सबसे बडा सामाजिक संगठन है। इसमें स्व भावना से प्रेरित होकर लाखों स्वयं सेवक प्रतिवर्ष जुड़ते जा रहे हैं। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि संघ पूर्णतः एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है। संघ भारत के समस्त नागरिकों के कल्याण और राष्ट्रनिर्माण में उनकी भूमिका के लिए एक अच्छे भारतीय नागरिक का निर्माण करता है।

संघ पर अक्सर आरोप लगते हैं कि वह एक राजनीतिक संगठन हैं। संघ राजनीतिक संगठन तो नहीं है बल्कि भारतीय जनता पार्टी में संघ की भूमिका एक अभिभावक की भांति है। फिर भी भारतीय जनता पार्टी में अधिकांश राजनीतिक फैसले स्वयं लिए जाते है उनमे संघ की कोई भूमिका नहीं होती। मगर इतना जरूर हैं कि समय-समय पर संघ भाजपा को कुछ सुझाव देता है जिन्हें स्वीकार करना या न करना भाजपा के विवेक पर निर्भर रहता है। यह भी सच हैं कि संघ के बहुत सारे पदाधिकारी समय-समय पर सक्रिय राजनीतिक में आए और उन्होंने भाजपा में शीर्ष पदों को प्राप्त किया। मगर संघ ने कभी भाजपा को अपनी शक्ति के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया। इतना ही नहीं संघ ने अपेन 100 वर्षों के सफर के दौरान कभी भी भाजपा नीत राज्य सरकारों अथवा केंद्र सरकार से किसी तरह की मदद अथवा अनुदान नहीं लिया। संघ नितांत समाजिक चंदे से चलने वाला संगठन है। जिसने कभी भी सरकार से कोई आर्थिक मदद नहीं ली। संघ दुनिया का एकमात्र ऐसा संगठन है जो अपने चंदे की पाई-पाई का हिसाब रखता है। उसके जितने भी अनुषांगिक संगठन है सभी समाज के चंदे से ही चलते है।
शाखा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्राथमिक ईकाई है। जमीनी स्तर पर शाखा के साथ ही सर्वप्रथम कार्यकर्ता का जुड़ाव होता है। शाखा में कार्यकर्ताओं को शारीरिक, वैचारिक और मानसिक स्तर पर प्रशिक्षत किया जाता है। देशभर में इस समय संघ की 83 हजार से अधिक शाखाएं संचालित है जो सुबह एवं शाम के समय लगाई जाती है। शाखा में आने के बाद कार्यकर्ता के कौशल को निखारने और उन्हें वैचारिक तौर पर मजबूत करने के लिए संघ व्दारा वर्ष में प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन भी किया जाता है। भारत में रहने वाला कोई भी हिंदू शाखा में जाकर संघ का स्वयं सेवक बन सकता है। शाखा में कोई जातिगत भेदभाव नहीं होता और किसी को भी उनके सरनेम से संबोधित नहीं किया जाता। संघ अपनी शाखाओं के माध्यम से एक ऐसी जीवनशैली को विकसित कर रहा है जो राष्ट्र के प्रति पूर्ण रुप से समर्पित और तत्पर रहती है। संघ इसी परिपाटी का 100 वर्षों से अनुसरण कर रहा है। संघ में प्रवेश करने के बाद सभी एक समान हो जाते है। सामाजिक समरसता का सबसे विराट भाव संघ में ही देखने को मिलता है।
वामपंथियों व्दारा अक्सर यह आरोप लगाया जाता हैं कि संघ महिला विरोधी है। शायद उन लोगों को नही पता कि संघ में मातृशक्ति को दुर्गा मां की तरह पूजा जाता है। 1936 में संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार के समय में ही महिलाओं के लिए संघ ने राष्ट्र सेविका समिति का गठन किया था। राष्ट्र सेविका समिति का संघ के सभी राष्ट्रीय कार्यक्रमों में सहयोग एवं समन्वय रहता है। संघ की सबसे बड़ी विशेषता यह हैं कि यहां व्यक्ति पूजा का कोई महत्व नहीं है। अपनी स्थापना से ही संघ भगवा ध्वज को गुरु मान कर पूजता है। हालांकि संघ में सरसंघचालक का पद सर्वोच्च होता है। सरसंघचालक के बाद सरकार्यवाह का स्थान आता है। इनके उपरांत अन्य राष्ट्रीय पदाधिकारी होते है। संघ में सरसंघचालक ही अपने अगले उत्तराधिकारी का चुनाव करते हैं। यह व्यवस्था संघ में उसके संस्थापक डॉक्टर साहब के समय से ही चलती आ रही है।
संघ भारत वर्ष को 46 प्रांतों में विभाजित कर अपना संगठन चलाता है। प्रांत के उपरांत जिला, विभाग एवं मंड़ल स्तर पर संघ का कार्य संचालित होता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ दुनिया का एकमात्र ऐसा सामाजिक संगठन हैं जिसके 36 से अधिक अनुषांगिक संगठन है। संघ के यह सभी संगठन दिन-रात समाज सेवा और राष्ट्रसेवा में लगे हुए है। संघ ने समाज सेवा के अप्रतिम कार्य करते हुए लगातार विरोधियों के झूठे आरोपों का भी सामना किया। 1948 में 30 जनवरी के दिन नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की गोलीमार कर हत्या की तब सरकार ने गोडसे को संघ का स्वयं सेवक बताते हुए संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि गोडसे कभी संघ के स्वयं सेवक नहीं रहे। इसके बाद जल्दी ही सरकार ने बिना किसी शर्त के संघ से प्रतिबंध हटा लिया। संघ पर दूसरी बार 1975 में इंदिरागांधी सरकार व्दारा प्रतिबंध लगाया गया। इंदिरा गांधी ने 1975 में देश में आपातकाल लगा कर सभी सामाजिक संगठनों का गला घोंटने का काम किया था। संघ भी उनमे शामिल था। 1975 में संघ पर लगा प्रतिबंध 1977 में जनता पार्टी की सरकार के गठन के बाद हटाया गया। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद संघ पर तीसरी बार प्रतिबंध लगाया गया। जिसे सरकार ने 1993 में हटा लिया। संघ पर तीनों पर सरकार ने अनुचित तरीके से प्रतिबंध लगाया जिसका जांच के बाद सरकार प्रतिबंध वापस लेने के लिए बाध्य हुई।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने एक शताब्दी की यात्रा पूरी कर ली है। इस एक शताब्दी के सफर में संघ ने भारत के अधिकांश लोगों तक अपनी पहुंच बना ली है। संघ को लेकर देश की जनता के मन में अब कोई दुविधा नहीं है। अधिकांश लोगों को लगता हैं कि संघ है तो वह समाज में सुरक्षित है। संघ ने बहुत हद तक भारतीय समाज व्यवस्था से जातिगत भेदभाव को खत्म करने का काम किया है। संघ में सामाजिक समरसता का जो भाव है वह अन्य किसी संगठन में दिखाई नहीं देता।संघ के विरोधी अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि संघ के संगठनात्मक स्वरुप में दलितों और पिछड़ों का स्थान नहीं है। मगर यह सच्चाई नहीं है संघ में पिछड़े और दलित समुदाय के बहुत सारे पदाधिकारी है। चूंकि संघ जातिगत व्यवस्था को छोड़कर सबके कल्याण के लिए काम करता है इसलिए पिछड़ा और दलित वर्ग के पदाधिकारी (प्रचारक) स्वयं भी इस मुद्दे पर बात नहीं करते।
संघ आज समाज के हर क्षेत्र में कामकाज कर रहा है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, बालिका शिक्षा, श्रमिक कल्याण, स्लम विकास, उच्चशिक्षा, पत्रकारिता, विज्ञान, स्वदेशी, राष्ट्रीय सुरक्षा, आदिवासी कल्याण, सामाजिक समरसता, पर्यावरण, छात्र और नारी सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में संघ के 36 संगठन राष्ट्रव्यापी काम कर रहे हैं। सभी संगठन एक दूसरे के साथ पूरे समन्वय के साथ काम करते है। हालांकि सभी का अपना-अपना स्वतंत्र संगठन और कार्यक्षेत्र है। मगर इन सभी संगठनों की प्रगति रिपोर्ट पर साल में एक बार संघ की अखिल भारतीय समन्वय बैठक में चर्चा होती है। पिछले 12 वर्षों के दौरान संघ को लेकर लगातार चर्चाएं हो रही है। इसका कारण यह हैं कि देश में पिछले 12 वर्षों से लगातार संघ के विचारवाली सरकार काम कर रही है। संघ पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता हैं कि संघ भारतीय संविधान को नहीं मानता। इस बात का जवाब साल 2018 में दिल्ली के विज्ञान भवन में एक आयोजन के समय संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत का वह बयान मुझे याद आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि देश की संविधान हमारे लोगों ने ही तैयार किया इसलिए संविधान के अनुशासन का पालन करना हम सबका कर्त्तव्य है। संघ भारतीय संविधान को और उसके सभी प्रतीकों का सम्मान करता है। अपने शताब्दी वर्ष में संघ ने सभी देश वासियों से आव्हान किया हैं कि संविधान ने देश के नागरिकों को जिन कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए कहा हैं उनका सभी देशवासियों को पालन करना चाहिए। संविधान को लेकर संघ में कोई विरोधाभास नहीं है वह आजादी के बाद से भी भारतीय संविधान के साथ खड़ा है।
संघ राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की बात करता है। वह भारत के विभाजन को विनाशकारी मानता है। देश के विभाजन और उसकी पीड़ा के दंश को भारत की अस्मिता के खिलाफ सबसे बड़ा अघात बताता है। संघ के प्रति झूठ और नफरत फैलाने वालों की लंबी फेहरिस्त है। वामपंथी इकोसिस्टम, कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतें और कांग्रेस का एजेंडा हमेशा संघ के खिलाफ रहा। हालांकि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने 1962 में चीन युध्द के समय संघ की राष्ट्र के प्रति भूमिका की मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी। जिसके बाद 26 जनवरी 1963 की राजपथ पर निकली गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के कार्यकर्ताओं को शामिल होने का न्यौता दिया गया था। संघ के खिलाफ खड़ी ताकते एकजुटता के साथ उसके खिलाफ दुष्प्रचार और मिथ्या आरोप लगाती रही। मगर संघ ने चुपचाप अपनी यात्रा जारी रखी और समाज के साथ मिलकर काम करता रहा।
संघ के कामकाज की सबसे बड़ी विशेषता यह हैं कि किसी भी कामकाज का श्रेय खुद नहीं लेता बल्कि समाज के नेतृत्व को ही उसका श्रेय देता है। संपूर्ण हिंदू जातियों का यह संगठन आज दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन है। भारत के दूरदराज के क्षेत्रों से लेकर पूर्वात्तर के राज्यों तक आज संघ की पहुंच है। अपनी इस पकड़ को संघ ने कभी अपनी शक्ति का नाम नहीं दिया बल्कि इसे समाज परिवर्तन का आधार माना। संघ का कहना हैं कि जिस तरह से समाज में जागरुकता और चेतना आ रही है उससे वह स्वयं सशक्त हो रहा है। आज संघ आर्थिक, शैक्षणिक, सामाजिक, वैश्विक और सामरिक क्षेत्र में ऐसे विशेषज्ञ खड़े करने का काम कर रहा है जो देश के लिए दिनरात काम कर रहे हैं। संघ के कामकाज में जो प्रतिबध्दता प्रतिलक्षित होती है वह अन्य किसी संगठन में दिखाई नहीं देती। यही प्रतिबध्दता उसके राष्ट्र के प्रति समपर्ण को प्रदर्शित करती है। आरक्षण, जातिगत जनगणना, संविधान, महिला आरक्षण और राष्ट्रीय नीतियों को लेकर संघ की स्पष्ट राय है जो बार-बार मीडिया के विभिन्न माध्यमों से देश के समक्ष पहुंचती रहती है।




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