हाईप्रोफाइल आयकर छापों और काला धन केस के बीच मध्यप्रदेश के नेताओं और अफसरों के लिए एक और चिंताजनक खबर है। खासतौर पर पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा और उनसे जुड़े लोगों के लिए यह खबर किसी सदमे से कम नहीं है...
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2024 का साल जाते-जाते प्रदेश के नेताओं और अफसरों के लिए टेंशन देकर गया है। हाईप्रोफाइल आयकर छापों और काला धन केस के बीच मध्यप्रदेश के नेताओं और अफसरों के लिए एक और चिंताजनक खबर है। खासतौर पर पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा और उनसे जुड़े लोगों के लिए यह खबर किसी सदमे से कम नहीं है कि ई-टेंडर घोटाले की फाइलें फिर से खुलने वाली हैं। सबसे पहले आपको यह बता रहा है कि 3000 करोड़ से भी ज्यादा के इस घोटाले में EOW के विशेष न्यायालय ने इस केस के खात्मे को रद्द कर दिया है। साथ ही तमाम नए बिंदुओं के आधार पर फिर से पूरे मामले की जांच के निर्देश दिए हैं। अगर इस मामले की सही से जांच होती है तो कई नेताओं और अफसरों का नपना तय है। आइए इस केस के एक- एक बिंदु को विस्तार से समझते हैं।
मप्र का ई-टेंडरिंग घोटाला अप्रैल 2018 में उस समय सामने आया था, जब जल निगम के 3 टेंडर को खोलते समय कम्प्यूटर ने एक संदेश डिस्प्ले किया। इससे पता चला कि टेंडर में टेम्परिंग की जा रही है। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के आदेश पर इसकी जांच मप्र EOW को सौंपी गई थी। प्रारंभिक जांच में पाया गया था कि जीवीपीआर इंजीनियर्स और अन्य कंपनियों ने जल निगम के तीन टेंडरों में बोली की कीमत में 1769 करोड़ का बदलाव कर दिया था। ई टेंडरिंग को लेकर ईओडब्ल्यू ने कई कंपनियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की हुई है।
23 नवंबर 2022 को मध्य प्रदेश सिंचाई विभाग के बहुचर्चित ई-टेंडरिंग घोटाले के आरोपियों को अदालत ने दोषमुक्त कर दिया गया। दरअसल अभियोजन पक्ष घोटाला साबित करने में विफल रहा। बता दें कि इस मामले को लेकर कोर्ट में कुल 35 गवाहों के बयान दर्ज हुए थे। स्पेशल कोर्ट ने आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अर्थात EOW अपने आरोप साबित करने में नाकाम रहा।
दरअसल इस घोटाले में ई-टेंडर के पोर्टल को हैक कर और टेंडर में हेर-फेर कर पसंद की कंपनियों को टेंडर देने का आरोप था। करोड़ों के इस घोटाले में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री और वर्तमान गृहमंत्री के ओएसडी के खिलाफ EOW ने मामला दर्ज किया था। लगभग 3 हजार करोड़ के इस घोटाले में अनेक जगहों पर जांच एजेंसियों ने छापेमारी की थी। वहीं इस मामले में आरोपी पक्ष के वकील प्रशांत हरने ने बताते हैं कि उन्होंने कोर्ट में दलील दी थी कि टेंडर होने के समय ही टेंपरिंग पकड़ ली गई थी। जिन टेंडर्स में टेंपरिंग की गई थी उन्हें निरस्त करके नए टेंडर जारी कर दिए गए थे। इसका मतलब घोटाला हुआ ही नहीं था। पहले ही पकड़ा जा चुका था।
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इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम के तत्कालीन ओएसडी नंदकुमार ब्रह्मे, इस मामले के व्हिसिल ब्लोअर थे। सबसे पहले जल निगम ने ब्रह्मे को ही जानकारी दी थी, जिसके बाद उन्होंने ही संबंधित कंपनियों को जांच के
लिए लिखा था और उन्हीं पत्रों पर जांच हुई थी। बाद में उन्हीं को आरोपी बना दिया गया था।
1. एमपीएसईडीसी (MPSEDC) ने 29 मार्च 2019 को पत्र क्रमांक 6865 के माध्यम से ईओडब्ल्यू को भेजे गए वीपीएन लॉग्स से संबंधित साक्ष्य जुटाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत एमपीएसईडीसी से संबंधित पत्रों और जानकारी की प्रतियां मांगी गई हैं।
2. एमपीएसईडीसी ने 3 मई 2019 को पत्र क्रमांक 419 के माध्यम से भेजी गई जानकारी की सत्यता की पुष्टि करने के निर्देश दिए हैं। ईओडब्ल्यू को इस पत्र और संबंधित जानकारी की प्रतियां भी प्राप्त करनी होंगी।
3. पीटी राउटर के आईपी एड्रेस 164.100.196.120 से संबंधित इंटरनेट ट्रैफिक का विश्लेषण करने के लिए इंटरनेट सेवा प्रदाता से जानकारी लेकर साक्ष्य जुटाने को कहा गया है।
4. प्रमुख अभियंता कार्यालय से टेंडर लॉग डिटेल प्राप्त करने के निर्देश दिए गए हैं। इसे लेकर आवश्यक दस्तावेज और साक्ष्य जुटाने पर जोर दिया गया है।
5. प्रकरण से जुड़े अन्य सभी सुसंगत साक्ष्यों को संकलित करने का आदेश दिया गया है।
6. ईओडब्ल्यू को निर्देश दिया गया है कि प्रकरण की मूल फाइल और केस डायरी प्राप्त होने के बाद कानूनी प्रक्रिया के अनुसार कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।




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