दिव्य-दूत

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बदले युग में बुढ़ापे की लाठी फेसबुक-- है ना अजीब दास्तां

Anil Choubey 22-08-2019 16:28:51


                                                                                     विशेष

         तेजी से बदलते वक्त ने उन तमाम मान्यताओं को समाप्त कर दिया है जिसके भरोसे हमारा समाज आज से तीस  साल पहले अपनी लाठी पर खड़ा था ,, तीस -- चालीस साल पहले संयुक्त परिवार की परंपरा होती थी एक चूल्हा होता था जिसमें तमाम तरह की रोटियां  सेकी  जाती थी  |  सब मिलजुल कर एक दूसरे के सुख-दुख को आपस में बांट लेते थे संयुक्त परिवार में जो सबसे बड़ा बुजुर्ग होता था उसकी बात  पूरा परिवार सामान्यतः  मान लेता था  समय बदला सोच बदली बुजुर्गों के दखलअंदाजी पर धीरे धीरे विरोध शुरू हुआ विरोध का कारण भी था बुजुर्ग अपनी सोच अपने अनुभवों के अनुसार घर की मान मर्यादाओं को  देखते हुए  निर्णय सुनाते रहे और ज्यादातर लोग उसको मानते भी रहे |

                  इन 40 वर्षों में वक्त इतनी तेजी से बदला की जरूरतों के अनुसार जब कमाई कम हो गई तो परिवार का विखंडन शुरू हुआ बुजुर्ग भी शारीरिक रूप से और आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण अब उनकी सुनवाई और तूती  में कमी आई संयुक्त परिवार के क्षरण का युग शुरू हो चुका था सब अब सिर्फ और सिर्फ अपनी ओर देखने लगे थे इसी बीच दो या तीन बच्चों का कंसेप्ट भी तेजी से आगे बढ़ रहा था परिवार का जो बड़ा लड़का होता था निश्चित रूप से सबसे ज्यादा सुख सुविधाओं का भोग कर आगे बढ़ा था लेकिन जब दूसरे बेटों पर बेटियों  की जिम्मेवारी उसके कंधों पर आई तो वह लड़खड़ा गया और इसी लड़खड़ा हट के कारण वह छोटे-छोटे निहित कारणों को परिवार के सामने रखकर परिवार से अलग हो गए परिवार टूट चुका था संयुक्त परिवार की परंपरा मैं बिखराऊं के साथ साथ एक के बाद एक एक के बाद एक सभी अपने बाल बच्चों के साथ अलग हो गए अपने घर  अलग बना लिए अब तीज त्यौहार शादी विवाह  के मौकों पर बड़े बूढ़े वटवृक्ष के नीचे इकट्ठे होने लगे समारोह के समाप्त होते हैं सब  अपने अपने घरों में वापस चले गए इस तरह वह बुजुर्ग फिर अकेला ही रह गया कभी इस बच्चे के पास तो कभी उस बच्चे के पास जाकर अपना समय व्यतीत करने लगा  बच्चों के बच्चों के साथ जो  उस बुजुर्ग का का अधिकार भी था  समय पास करने लगा लेकिन वह  आत्मीयता वहां भी नहीं मिल  सकी |

                  आज का युग बिल्कुल ही बदल गया है टेलीविजन के जीवन में प्रवेश होते हैं परिवार, दोस्त ,यार, पड़ोसी सबसे धीरे धीरे  मिलना जुलना समाप्त हो गया अब टीवी के सहारे बचा हुआ परिवार समय काटने लगा तकनीकी ने तेजी के साथ एक करवट और  बदली की मोबाइल सेवा घर में पहुंच गई अब ताजे हालात यह है की संयुक्त परिवार से टूटे छोटे परिवार में भी पत्नी अपना अलग मोबाइल लेकर बैठी है पति अपना अलग मोबाइल लेकर बैठा है और बच्चे भी अपने अपने मोबाइल पर व्यस्त है यह दृश्य एक ही ड्राइंग रूम का है एक ही कमरे में बैठकर लोग घंटों एक दूसरे से ना तो बात करते हैं न एक दूसरे की तरफ देखते हैं सब अपने अपने मोबाइल पर ना जाने क्या खोजते रहते हैं और व्यस्त रहते हैं |

 बुजुर्ग दंपति के साथ सबसे बड़ी समस्या समय काटने की है ना तो कोई पड़ोसी एक दूसरे से मिलने आता है ना कोई दूसरे से बात करता है जो काम जिंदगी में लगे हुए हैं उनको करके तत्काल प्रभाव से मोबाइल हाथ में लेकर दीन दुनिया से तो जुड़ जाता है लेकिन अपने आसपास की दुनिया में वह खो जाता है आज बिखरे हुए परिवारों में एक दूसरे की चाहत एक दूसरे के प्यार को छोड़कर सभी तकनीकी की भरोसे जीवन जी रहे बड़ा मुश्किल काम है अब इस युग में फैली इस बेसुरी तकनीकी बीमारी को कैसे सामाजिक समर सत्ता में लाया जा सके मुमकिन नहीं लग रहा सब व्यस्त हैं एक दूसरे की तरफ देखने की भी फुर्सत नहीं है यह स्थिति आ गई है

 उल्लेखित कार्टून में जो व्यंग है वह बिल्कुल सटीक है समयानुसार है कि अब उस बुजुर्गों को जिसकी संयुक्त परिवार में लाठी बेटा पोता बनता था अब क्योंकि बेटा और पोता मोबाइल पर इतने व्यस्त हैं की बुढ़ापे की लाठी तो छोड़ बुढ़ापे की ओर देख भी नहीं रहे तब ऐसी स्थितियों में फेसबुक ही अब हमारे द्वारा बोए गए इस दुष्प्रभाव के समय में एक सहारा है कि चलो जब सब फेसबुक टि्वटर व्हाट्सएप पर व्यस्त हैं तो क्यों ना हम भी उसी फेसबुक को अपनी बुढ़ापे की लाठी मानकर समय काट लें और इस दुनिया से अलविदा हो जाए

 तकनीकी का जीवन में जितना उपयोग नहीं हुआ है उससे कहीं ज्यादा इस मनुष्य के चंचल मस्तिष्कने  उसका दुरुपयोग किया और अपनी सुविधा के अनुसार तकनीकी का गुलाम हो गया वह भूल गया की इसी समाज में रहकर उसे कुछ ऐसे भी काम करना चाहिए जिसे लोग याद रखें लेकिन नहीं कब आया कब चला गया इस दुनिया से पड़ोसी को भी पता नहीं वो कितना संकुचित और कंजरवेटिव हो गया है की बाजू में क्या हो रहा है उसे उससे कोई लेना देना नहीं सबसे खास बात यह है कि वह इन तकनीकों से पूरे विश्व की खबर रखता है और बाजू में क्या हो रहा है इससे उसको पता नहीं बाजू में क्या उसके घर के अंदर बच्चे क्या कर रहे हैं पत्नी क्या कर रही है उसे क्या जरूरत है उसका भी उसे होश नहीं है यह है तकनीकी का  जुर्म

 

 

 


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