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Feroz Khan, Author & Researcher ,, Yogita Singh Author & Researcher ,
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बस्तर23/07/2024 / पृथ्वी की उत्पत्ति 4.54 बिलियन वर्ष पहले हुई। प्रारंभिक गुरुत्वीय पतन के लगभग 500 मिलियन वर्ष बाद पृथ्वी का कोर बना। पृथ्वी ठंडी होकर जम गयी। उसके बाद ही पृथ्वी के भू-भाग एवं समुद्र अस्तित्व में आए। पृथ्वी निर्माण के बाद एक कोशीय जीव ( Unicellular) की विकास यात्रा प्रारम्भ हुई। वह बहुकोशिकीय जीव ( Multicellular) में बदला । फिर बिना हड्डी वाले, हड्डी वाले, रेंगने वाले, स्तनधारी, चौपाये होते हुए पहला मनुष्य होमोसेपियन्स बना।
भू-भाग बनने के बाद "" बस्तर "" का क्षेत्र भी अस्तित्व में आया। 39114 वर्ग किमी बस्तर का क्षेत्र अंडाकार स्वरूप में है । जिसकी उत्तर से दक्षिण तक लंबाई 290 किमी एवं पूर्व से पश्चिम तक चौड़ाई 200 किमी है।
आदिमानव की उत्पत्ति लगभग 4 लाख वर्ष पूर्व भूमध्यसागर से लेकर साइबेरिया तक के क्षेत्र में फैल गये थे। बस्तर में आदिमानव का विस्तारण लगभग 3 लाख वर्ष पूर्व हुआ था
धीरे धीरे उनका विस्तारण अन्य क्षेत्र में होने लगा। जिनका दिमाग होमोसेपियन्स से औसत बड़ा था । 3 लाख वर्ष पहले बस्तर के आदिमानव नदी के किनारे पेड़ों पर, पहाड़ों की गुफाओं में निवास करते थे। जिससे उन्हें जंगली पशुओं से सुरक्षा मिलती थी । बस्तर के पहाड़ों पर मुख्यतः आर्कियन पत्थर एवं दक्कन ट्रैप पत्थर हैं। बस्तर के आदिमानव कंद, मूल, फल, पत्तियां, फूल, मछली मारना एवं जंगली जानवरों का आखेट कर उनके मांस का भक्षण करते थे। कहीं कहीं पर विशाल गुफाएं भी हैं जहां 500 तक आदिमानव का निवास था ।

आदिमानव के क्रमिक विकास के साथ साथ वे समूह में रहने लगे। धीरे-धीरे क्रमशः वे खेती की ओर अग्रसर हुए एवं "" पेंदा खेती "" या "" झूम खेती "" Shifting cultivation करने लगे। पूरे बस्तर में पहाड़ों व जंगलों की अधिकता थी । वे जंगलों को काटकर उसमें अनाज बोने का कार्य करते थे। धीरे-धीरे वे सामूहिक रहवास, अनाज भक्षण एवं वनों को काटे गये समतल भूमि पर मेड़ बनाने का काम करने लगे।
आदिमानव का दिमाग होमोसेपियन्स से ज्यादा तेज था। अतः वे जो सोचते उसे पत्थर पर उकेरने भी लगे। पाषाण कालीन युग में वे औजार, हथियार, खेती-बाड़ी करने की सामग्री बना चुके थे।
बस्तर के घाट लोहंगा, देऊरगांव,बिन्ता ,भटेवाडा, गढ़ चन्देला, चित्रकोट, आलोर, चन्देली,गांडागौरी, कोदागांव,उडकुडा, गोटीटोला, बेवरती, गुमझीर आदि गांवों में पुराकालीन औजार, बर्तन, शस्त्र एवं शिलापट्ट व शिलालेख, शैल चित्र आज भी विद्यमान हैं।

कांकेर जिले के ग्राम उडकुडा के पहाड़ी पर विद्यमान है "" जोगी दरबार ""।
कांकेर जिले के ग्राम उडकुडा के पहाड़ी पर विद्यमान है "" जोगी दरबार ""। दरबार में तीन पत्थरों पर एक चौड़ा विशालकाय पत्थर आच्छादित है। आदिवासी संस्कृति के अनुसार आज भी इस गुफा में 18 देवी देवताओं की अदृश्य बैठकें होती हैं। बताते हैं यह गुफा कभी पांडवों का आश्रय स्थल था । इस गुफा में आदिमानव द्वारा बनाए शैल चित्र उकेरे गए हैं। अपनी दैनंदिनी की बातों को इन शैल चित्रों में प्रदर्शित किया गया है। गुफा के छत में भी हाथों का शैल चित्र हैं। ये शैल चित्र लगभग 12000 वर्ष पुराने हैं।कांकेर जिले के चन्देली व गोटीटोला ग्राम में पहाड़ों के गुफाओं पर भी आदिमानव द्वारा शैल चित्र बनाये गये हैं। जो प्रदर्शित करता है कि उन्हें समूह में रहने की आदत थी, अकेले कहीं बाहर जाने पर पत्थरों के अस्त्र हाथों में लेकर निकलने की प्रवृत्ति हो गयी थी। शायद उन्हें जंगली जानवरों से मुठभेड़ की आशंकाएं रही होगी। अस्त्र से वे उसका मुकाबला कर सकते थे। इन शैल चित्रों को 12000 वर्ष पूर्व का बताया जाता है।
ग्राम गांडागौरी के राऊरपारा में जब आदिमा नव का क्रमिक विकास के साथ गुफा छोड़कर गांव बसाने के उपक्रम का ढांचा विद्यमान है। बहुत बड़े क्षेत्र में गांव बसाहट का पुरावशेष अभी भी स्थित है। पास के जंगल के पत्थरों पर सामूहिक अन्न कुटाई या वनोपजों से तेल या अन्य उपोत्पाद प्राप्त करने के लिये खल बत्ता जैसा पत्थरों पर बड़ा बड़ा गड्ढा बनाया गया है। जिसमें एक ही चट्टान में गड्ढों पर अलग अलग कुटाई सामूहिक रूप से होता था । आज राऊरपारा, गांडागौरी में आदिमानव के गांव के पुरावशेष विद्यमान है। यह लगभग 8000 से 10000 वर्ष पुराना है।
बस्तर के आदिमानव के परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती थी तो शव को जंगल में फेंक दिया जाता था। जिसे जंगली जानवरों द्वारा खा लिया जाता था। क्रमिक बौद्धिक विकास के बाद शवों को गड्ढे खोदकर दफनाने की प्रथा शुरू हुई। यह प्रथा लगभग 3000 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुई। शव के सिरहाने वाले भाग एक बड़ा पत्थर गड़ा कर चिन्हित करने का कार्य किया जाता था। यह प्रथा व भी बस्तर की विभिन्न संस्कृतियों में पाते हैं। कांकेर जिले के ग्राम मुड़पार में ये आज भी है। जो पुरातन काल का है।

कांकेर जिले के चन्देली व गोटीटोला ग्राम में पहाड़ों के गुफाओं पर भी आदिमानव द्वारा शैल चित्र बनाये गये हैं
बस्तर के आदिमानव में शव को दाह संस्कार का कार्य 1300 ईसा पूर्व के आस पास दर्ज किया गया। लंबे समय बाद यह आम प्रथा बनी । बस्तर में आदिमानव के क्रमिक विकास के साथ साथ जाति, प्रजातियों में आबादी पृथक हो गयी। जिसमें प्रमुख जाति गोंड,हल्बा,भतरा,मुरिया, माडिया,दंडामी माडिया, दोरला, धुरवा,गदबा एवं परजा है।

"" टोटेम ""
बस्तर में आज भी विभिन्न जातियों में शव को दफनाने व दाह संस्कार की दोनों प्रथा चल रही है।तोकापाल एवं बास्तानार विकास खंड में मुख्यतः माडिया जनजाति में शवों दफनाने या दाह संस्कार के बाद "" टोटेम "" स्थापित करने का संस्कार है। अपने प्रिय व्यक्ति के अंतिम संस्कार के बाद परतदार चट्टानों से लगभग 6 फीट ऊंचा टोटेम बनाने का कार्य करते हैं। 1 या 2 फीट चौड़े पत्थरों को अंतिम संस्कार स्थल पर गडा कर उसमें चित्र उकेरे जाते हैं। ये चित्र कुल देवता,कुल देवी, कुल वृक्ष, कुल पशु आदि के होते हैं। जिसे टोटेम कहा जाता है।
क्रमिक विकास के बाद अब आधुनिक खेती की ओर भी आदिवासी अग्रसर हैं। जिसमें ट्रैक्टर आदि का उपयोग कर रहे हैं।




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