नरेन्द्र कुमार वर्मा
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के नतीजों ने सभी को हैरान कर दिया। पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गज और मोदी सरकार के मंत्री चुनाव में धराशाही हो गए। पार्टी रणनीतिकारों को भी इस बात का अहसास नहीं था कि उनके उम्मीदवारों को जनता इस तरह से नकार देगी। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता इस संवाददाता से बात करते हुए कहते हैं कि “जो परिणाम आपको उत्तर प्रदेश में दिखाई दिए उनके पीछे केवल योगी की पकड़ है। पार्टी ने जिस तरह से प्रदेश में चुनावी कैंपेन चला रखा था उसमें से जमीनी कार्यकर्ता और संगठन के नेता गायब थे।” उत्तर प्रदेश की इस जमीनी हकीकत को केंद्र के नेता समझ नहीं सके। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने राष्ट्रीय नेतृत्व को कई बार आगाह किया था कि मौजूदा सांसदों में से 40 को अगर दोबारा रिपीट किया गया तो पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। मगर राष्ट्रीय नेतृत्व ने अपने अनुभव के सामने योगी के अनुभव को तरजीह नहीं दी। पार्टी के एक नेता बताते हैं कि इस करारी हार के कई अहम कारण है। जिसमें से पहला बड़ा कारण टिकटों का गलत वितरण रहा।
भाजपा के जो मौजूदा सांसद और मंत्री चुनाव में खेत रहे उनके खिलाफ उनके संसदीय क्षेत्र के भाजपा विधायकों में ही भारी असंतोष था। हालात यह थे कि सांसद और मंत्री अपने ही विधायकों को घास नहीं डाल रहे थे। कई मंत्री और सांसद तो ऐसे भी थे जिन्हें यह गुमान था कि मोदी ने उन्हें उनकी जाति की अहमियत देखकर उन्हें मंत्री बनाया है। ऐसे मंत्रियों और सांसदों का रिपोर्टकार्ड योगी आदित्य नाथ की टेबिल पर छह महिने पहले ही आ चुका था। योगी जातिय समीकरण को ध्यान में रखकर नए चेहरों को मौका देने की पैरवी कर रहे थे। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और संगठन का एक खेमा भी इन चुनावों में पूरी तरह से साइलेंट मोड में रहा। वहीं राजपूत और ब्राह्मण मतदाताओं ने जीती हुई बाजी को पलट दिया। लाख प्रयास के बाद भी पार्टी राजपूतों को साधने में सफल नहीं हो पाई। एक बड़े राजपूत नेता का टिकट काटने से पार्टी को वेस्टन यूपी में पांच सीटों से हाथ धोना पड़ा। भाजपा के नेताओं को इस बात का इल्म था कि मुसलमान पूरी तरह से कांग्रेस सपा गठबंधन की तरफ एकजुट है। फिर भी पार्टी हिंदुओं के ध्रुवीकरण को गति नहीं दे पाई। पार्टी के एक नेता कहते हैं अपना दल, सुभासपा और निषाद पार्टी जैसे जातियों के दलों को लोकसभा स्तर पर सीटें देने का कोई औचित्य नहीं था।पार्टी के जनसंपर्क अभियान से संगठन के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को दूर रखना और सांसदों की टीम के लोगों का चुनाव अभियान में हावी होना घटिया मैनेजमेंट का प्रमाण रहा।
वास्तव में यूपी की डबल इंजन वाली सरकार में खूब काम हुए। योगी सरकार कानून व्यवस्था, निवेश, विकास योजनाओं और महिला सशक्तिकरण में सफल रही। मगर कई अहम परीक्षाओं के पेपर लीक, संविदा कर्मियों का अनियमितीकरण, सरकारी कर्मचारियों की पेंशन को बंद करना और प्रशासनिक अधिकारियों का पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ ठीक से कॉर्डिनेशन न होने के कारण भी एकवर्ग में गुस्सा था। संघ के एक वरिष्ठ नेता इस संवाददाता से कहते हैं कि पार्टी जातिय समीकरण को पहचाने में असफल रही। कुर्मी, गुर्जर, सैनी, लोध, जाट, कश्यप, जाटव वर्ग के प्रभाव वाली सीटों पर पार्टी ने बड़ी भूल की। जबकि सपा कांग्रेस गठबंधन ने जमीन की सच्चाई को भांप कर कई-कई बार अपने उम्मीदवारों को बदला। फैजाबाद जैसी सीट पर भाजपा के सवर्ण उम्मीदवार को सपा के अनुसूचित वर्ग के उम्मीदवार ने हरा दिया। यह जातिगत गणित के कारण संभव हो पाया जिसे भाजपा समझ नहीं पाई। इस सच्चाई से कोई इनकार नहीं कर सकता कि चुनाव कभी भी विकास के मुद्दे पर नहीं जीते जाते। चुनाव हमेशा भावनाओं पर लड़ा जाता है। जनता की भावनाओं को सपा और कांग्रेस ने यह कह कर हवा दी कि भाजपा संविधान बदल देगी। जबकि भाजपा इस कुप्रचार की काट करने में सफल नहीं रहे।
भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में प्रदेश अध्यक्ष रत्तीभर भी सफल नहीं रहे। बल्कि जिलाध्यक्षों और संगठन के पदाधिकारियों की नियुक्ति में भी उन पर आरोप लगे थे। दरअसल उत्तर प्रदेश जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कर्मभूमि बना तब से सारे फैसले दिल्ली से होने लगे। दिल्ली की मोहर के बाद प्रदेश के किसी नेता की कोई औकात नहीं रही कि वह किसी फैसले पर कुछ बोल सके। प्रदेश में कई स्थानों पर ऐसे पोस्टर चस्पा थे कि जिन पर लिखा था मोदी योगी से बैर नहीं और मौजूदा सांसद की खैर नहीं। इस तरह के पोस्टरों के पीछे संघ के उन नेताओं का दिमाग था जो नकारा सांसदों के रवैये को जानते और समझते थे। मगर उनके विरोध को भी दरकिनार कर दिया गया। मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, कैराना, फिरोजाबाद, अलीगढ़, बंदायू, कैराना, बरेली, बस्ती, संतकबीरनगर, बलिया, जालौन, अयोध्या, कौशांबी, सलेमपुर, रामपुर, प्रतापगढ़ और धौरहरा जैसे संसदीय क्षेत्रों से स्थानीय संघ नेताओं की बराबर रिपोर्ट आ रही थी कि वर्तमान सांसदों को दोबारा उतारना का पार्टी को भारी खामियाजा उठाना पड़गा।
इससे पहले उत्तर प्रदेश में सभी तरह के चुनावों को लेकर संघ के नेताओं और भाजपा के नेताओं को बंद कमरें में बैठके होती थी। माना जाता हैं कि संघ के कार्यकर्ता सीधे जमीनी स्तर पर काम करते है और उनके पास जो फिडबैक होती है उसे बड़ी-बड़ी सर्वे एजेंसियां भी नहीं भांप पाती। पार्टी के एक नेता नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहते हैं कि गुजरात का फैसला अहमदाबाद से होता है मगर उत्तर प्रदेश का फैसला दिल्ली से होने लगा यही सबसे अधिक चिंता का सबब है। वास्तव में उत्तर प्रदेश बीजेपी को एक बार फिर सुनील बंसल जैसा मंजा हुआ संगठन मंत्री चाहिए। सुनील बंसल पार्टी कॉडर के साथ ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी तरजीह देते हैं। संगठन की कमियों और पदाधिकारियों के असंतोष की भी उन्हें सटिक जानकारी रहती है। सुनील बंसल उत्तर प्रदेश में कई तरह के प्रयोग करते रहे है जिसमें उनकी सफलता का ग्राफ शतप्रतिशत रहा। उत्तर प्रदेश ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को तो निराश किया ही है साथ ही देश भर में उनके चाहने वाले भी पार्टी के नकारा सांसदों को पानी-पी-पीकर कोस रहे है जिन्होंने मोदी योगी की मेहनत पर पानी फेर दिया।
(लेखकः दिव्यदूत के दिल्ली ब्यूरोचीफ हैं)




Copyright @ 2020 All Right Reserved | Powred by Divyadoot
Comments