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नरेन्द्र कुमार वर्मा
दिव्यदूत के नई दिल्ली ब्यूरोचीफ
नई दिल्ली 11/04/2024 //// उन्नीसवीं सदी की महान शख्सियत भारत रत्न डॉक्टर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विव्दान शिक्षाविद, कानूनी विशेषज्ञ, समाज सुधारक, राजनेता, संपादक और अपराजित समाजिक वक्ता थे। अपने कालखंड में वह एक मात्र ऐसे राजनेता थे जो न कवेल स्पष्ट वक्ता थे बल्कि दोटुक बात कहने वाले थे। भारतीय समाज में फैली अनेक सामाजिक कुरितियों को उन्होंने विरोध किया। मगर कभी भी अपने आंदोलनों से जनता को भड़काने या उकसाने का काम नहीं किया। अहिंसा वादि तरीके से सामाजिक बदलाव लाने की शुरूआत बाबा साहब व्दारा ही कि गई थी। बाबा साहब ने स्वतंत्र भारत के संविधान को तैयार किया और देश की अखंडता को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए संविधान में अनेक प्रावधानों को लागू किया।
बाबा साहब का संपूर्ण जीवन भारत के लिए था। उन्होंने भारतीय समाज में समता, समानता, बंधुत्व, मानवीय मूल्यों, सांस्कृतिक परंपराओं और सबको न्याय प्रदान करने के लिए जीवनभर काम किया। बाबा साहब जहां एक तरफ सच्चे राष्ट्रप्रेमी थे वहीं दूसरी तरफ दूरदर्शी राजनेता भी थे। देश में ब्रिटिश शासन के दौरान उन्होंने जब देखा कि मुसलमान नेताओं का एक बड़ा तबका भारत के विभाजन की विषैली योजना पर काम कर रहा है। तब उन्होंने अपने लेखों के माध्यम से उनकी कल्पना को भारतीय गणराज्य के खिलाफ बताया। बाबा साहब को बड़ी निर्भीकता के साथ अपनी बातों के कहने के लिए जाना जाता था। उन्होंने जब यह देखा और साफ तौर पर महसूस किया कि पाकिस्तान के निर्माण के लिए कट्टरवादी मानसिकता के लोग किस तरह आगे बढ़ रहे है। उसी समय “थॉट्स ऑफ पाकिस्तान” नाम से लिखी गई अपनी किताब में मुस्लिम लीग के नेताओं की कट्टरवादी सोच को उजागर किया। बाबा साहब ने “थॉट्स ऑफ पाकिस्तान” किताब में मुस्लिम नेताओं की सांप्रदायिक सोच और षड़यंत्रकारी नीतियों पर जमकर क्लास लगाई। उन्होंने लिखा ‘ मुसलमानों व्दारा राजनीति में हिंसक कार्य पध्दति अपनाना। हिंसक उपद्रव इस बात का पर्याप्त संकेत है कि गुंडागर्दी राजनीति में उनकी रणनीति का स्थायी भाग बन चुकी है। ऐसा लगता है कि वे सोचे समझे ढ़ंग से उन्हीं रीति-रिवाजों का अनुसरण कर रहे हैं जो सुडेटन जर्मन लोगों ने चेक लोगों के विरुध्द अपनाए थे।’
बाबा साहब ने यह देखा कि मुसलमान नेता कांग्रेस के साथ विश्वासघात करके अलग मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए पूरी शक्ति झोंके हुए है। तब उन्होंने अनेक लेखों के माध्यम से कांग्रेस के नेताओं को इस षड़यंत्र के खिलाफ आगाह करने का काम किया। मगर उस समय भी कांग्रेस आज की तरह ही मुस्लिम तुष्टीकरण में डूबी हुई थी। बाबा साहब अपनी किताब “पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया” में लिखते है ‘ मुसलमानों की दृष्टि में हिंदू काफिर है और काफिर सम्मान के योग्य नहीं होता। वह निष्ट जन्मा और प्रतिष्ठाहिन होता है। इसलिए काफिर व्दारा शासित देश मुसलमानों के लिए दारुल हरब होता है।’ देश की आजादी से पूर्व मुसलमानों व्दारा अनेक भारतीय समाज सुधारकों की हत्याएं की गई। मगर फिर भी गांधी जी ने कभी उनकी आलोचना नहीं की जबकि बाबा साहब इस तरह के कृत्यों की खुलकर आलोचना करते थे। बाबा साहब लिखते हैं कि गांधी जी का झुकाव मुसलमानों की तरफ रहने के बावजूद भी मोहम्मद अली जिन्ना उनके प्रति बेहद कट्टर इस्लामिक विचार रखते थे। डॉक्टर अंबेडकर लिखते हैं कि ‘जिन्ना कहते थे कि मेरे मजहब और मत के अनुसार मैं किसी भी व्यभिचारी और चरित्रहिन मुसलमान को गांधी से बेहतर मानता हूं’।
डॉक्टर अंबेडकर ने आजादी से पूर्व ही समझ लिया था कि देश के कट्टरपंथी मुसलमान भारत में कभी शांती और सदभाव का भाव नहीं पनपने देंगे। जब मुसलमानों ने उर्दू को राष्ट्रभाषा बनाने की तो उन्होंने उसे गैर वाजिब बताते हुए लिखा था कि ‘उर्दू को राष्ट्रभाषा बनाने की मुसलमानों की मांग विवेकहीन है क्योंकि 6.8 करोड़ मुसलमानों में मात्र 2.8 करोड़ ही उर्दू बोलते और समझते हैं ‘। अपनी किताब में बाबा साहब लिखते हैं कि ‘मैं भारत का बटवारा तभी पसंद करूंगा जब भारत के सभी मुसलमान पाकिस्तान चले जाए क्योंकि इससे ही दोनों देशों की सुरक्षा निश्चित और निष्कंटक रह सकती है’। आज भारत जिस कट्टरवादी इस्लामिक सोच के खिलाफ लड़ रहा है उसके प्रति बाबा साहब ने आज से 80 वर्ष पहले इंगित कर दिया था। उनका कहना था कि जिहादी मानसिकता और धार्मिक कट्टरता सारी मानवजाति और दुनिया के लिए खतरा है।
1941 में प्रकाशित “थॉट्स ऑन पाकिस्तान ” और 1945 में प्रकाशित “पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया” में बाबा साहब ने इस्लामिक कट्टरता, जिहादी विचारधारा, मुस्लिम आक्रांताओं के हमले, मोपला हत्याकांड और कांग्रेस में घुसे मुस्लिम नेताओं की असहिष्णुता और हठधर्मिता पर जमकर प्रहार किया। डॉक्टर अंबेडकर ने अपने कालखंड में बहुत गहराई के साथ इस्लाम के राजनीतिक स्वरूप और मुस्लिम कट्टरवाद का अध्ययन किया था। 1940 में जब जिन्ना ने कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में अलग पाकिस्तान की मांग का प्रस्ताव रखा था। उसी समय बाबा साहब समझ चुके थे कि मुसलमानों की सोच भारत के प्रति क्या है और वह किस कूटनीति और विचारधारा के साथ कांग्रेस में काम कर रहे हैं।
यहां यह बात भी उल्लेखनीय हैं कि बाबा साहब ने जितना विरोध हिंदू धर्म की कुरितियों का किया उससे दोगुना विरोध उन्होंने इस्लाम की कुरितियों के खिलाफ किया। हालांकि हिंदू धर्म ने अपनी पर्दाप्रथा, सती प्रथा, छूआछूत, बालविवाह, विधवा विवाह जैसी कुरितियों को स्वामी श्रध्दानंद जैसे मनीषियों के समाज सुधार आंदोलनों के बाद समाप्त कर लिया। इसीलिए बाबा साहब स्वामी श्रध्दानंद को अपना बड़ा भाई कहते थे। इस्लाम में पर्दा प्रथा का विरोध करते हुए वह अपनी किताब “पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया” के दसवें अध्याय लिखते हैं कि ‘पर्दा प्रथा से मुस्लिम महिलाएं अन्य जातियों की महिलाओं से पिछड़ जाती हैं। वह किसी भी तरह की बाहरी गतिविधि में भाग नहीं ले पातीं हैं जिसके कारण उनमें एक प्रकार की दासता और हीनता की मनोवृत्ति बनी रहती है। उनमें ज्ञान प्राप्ती की इच्छा भी नहीं रहती क्योंकि उन्हें सिखाया जाता है कि वह घर की चारदीवारी के बाहर किसी अन्य की बातों में रुचि न लें।’ वह आगे लिखते हैं कि ‘इस तरह की प्रथाओं से मुस्लिम महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा असर भी पड़ता है’। सामाजिक बुराईयों के खिलाफ आंदोलन चलाने के लिए बाबा साहब हिंदू समाज सेवियों की तारीफ करते हुए लिखते हैं कि मुसलमान समाज सुधार के प्रबल विरोधी है।
बाबा साहब में इतनी हिम्मत थी कि वह खुलकर जिन्ना और उनके साथियों को ललकारते थे। वह कभी भी सेलेक्टिव नहीं रहे उन्होंने बेबाक तरीके से लिखा कि ‘इस्लाम जिस भाईचारे की बात करता है वह केवल मुस्लिमों के साथ भाईचारे तक सीमित है जो इस बिरादरी से बाहर का है उसके लिए इस्लाम में कुछ नहीं है’। इस तरह की खरी-खरी बातें केवल बाबा साहब ही कह सकते थे। डॉक्टर अंबेडकर इस्लामिक मानसिकता को पूरी तरह से समझ चुके थे इसलिए उन्होंने हिंदू जाति के अपने समुदाय को चेतावनी देते हुए सख्त हिदायत दी कि किसी भी हाल में इस्लाम कबूल मत करना। हमारा समाज बाबा साहब का कर्जदार है जिन्होंने भारत के बटवारे के समय पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू धर्म के एक बहुत वड़े वर्ग को इस्लाम में जाने से बचा लिया।




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