दिव्य-दूत

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छतीसगढ़ में आक्रामक हुई भाजपा

Administrator 20-04-2019 23:24:31


अनिल पुरोहित

रायपुर .अमूमन हालात कांग्रेस के लिए वही नजर आ रहे हैं जो पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में थे. फर्क है तो यही कि, तब कांग्रेस अपनी ‘ऐतिहासिक पराजय’ के अनुमानों की पटकथा पढ़ रही थी और आज वह अपने इतिहास के उस मोड़ पर खड़ी है जहां वह अपने सियासी वजूद बचाने की जद्दोजहद में उलझी है. इसके उलट नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी जैसे मुद्दों की घेरेबंदी से  रक्षात्मक मुद्रा में खड़ी दिख रही भारतीय जनता पार्टी एकाएक फिर आक्रामक तेवर में आ रही है. यह सवाल अलहदा है कि एंटी इन्कम्बेंसी के स्थापित राजनीतिक सत्य को भाजपा क्या इन मुद्दों पर झुठला पाएगी? जाहिर है कि ये तीनों ही मुद्दे में भाजपा की परेशानी बढ़ाने वाले साबित हो रहे थे, लेकिन विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कूटनीतिक व रणनीतिक कौशल दिखाकर बाजी पलटने का कारगर बंदोबस्त कर लिया।. इसलिए 2014 में अपनी ऐतिहासिक पराजय के बाद भी कांग्रेस जन-मन को स्पर्श करती नहीं दिख रही है. ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने 2014 की पराजय-पटकथा के अध्याय से आगे बढने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई लेकिन राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि बावजूद इसके कांग्रेस अपनी जमीनी ताकत नहीं बढ़ा पाई. कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी से राहुल गांधी के हाथों आई, संगठन के ढांचे में हेरफेर हुआ, नए चेहरे सामने आए, पर फिर भी कांग्रेस यदि एक मजबूत राजनीतिक ताकत नहीं बन पाई है तो यह उसकी रीति-नीति में बदलाव नहीं आने का नतीजा है. और, यही वजह है कि जीवंत मुद्दों के बावजूद कांग्रेस खुद अब रक्षात्मक मुद्रा में खड़ी होकर इस या उस दल से गठबंधन में अपने वजूद और भविष्य को तलाशने के लिए विवश है. प्रियंका वाड्रा (गांधी) को कांग्रेस में महासचिव बनाने और पूर्वी उत्तरप्रदेश का जिम्मा सौंपने के बाद भी कांग्रेस की यह राजनीतिक विवशता अचंभे में डाल रही है. पर, यह भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक रणनीति का कौशल नहीं माना जा सकता. नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी जैसे मुद्दों से उसे छुटकारा मिल गया हो, ऐसा भी नहीं माना जाना चाहिए. हां, पुलवामा आतंकी हमले और फिर बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद अब मिशन शक्ति की सफलता पर कांग्रेस और शेष विपक्ष ने जिस तरह का आचरण प्रदर्शित किया, भाजपा ने बड़ी चतुराई से उसे अपने लिए राजनीतिक अवसर में बदल लिया. इसलिए राजनीतिक प्रेक्षकों को लगता है कि आने वाला लोकसभा चुनाव, जिसकी तारीखों का ऐलान हो चुका है, जातीय समीकरणों, मुद्दें पर उतना केन्द्रित नहीं रहेगा, जिसकी अपेक्षा कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों को डेढ़-दो महीने पहले तक थी. प. बंगाल में सीबीआई बनाम ममता बनर्जी प्रकरण से लेकर उसके बाद के घटनाक्रमों को संवैधानिक मर्यादा व राष्ट्रवाद से जोड़कर भाजपा अपने रक्षा-चक्र से बाहर आकर अपने ऊपर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हो रहे हमलों पर पटलवार करने लगी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के कार्यक्रमों, योजनाओं व उपलब्धियों पर केंद्रित होकर भाजपा जिस सफाई से विपक्ष को मुद्दविहीन कर ‘सिर्फ मोदी-विरोधी’ साबित करने में जुटी, उसकी काट विपक्ष ढूंढ़ नहीं पा रहा है. राफेल का मुद्दा कांग्रेस का हथियार बन नहीं पाया. उसे लेकर कांग्रेस हालांकि हमलावर है, लेकिन इसमें भी उसके निशाने पर सिर्फ मोदी-अंबानी हैं, जिनके लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी सभाओं में जिस संबोधन के साथ नारे लगवा रहे हैं, वह सारा देश सुन चुका है. कांग्रेस की  दिक्कत यह है कि वह हमलावर तो हो रही है, पर इसके लिए न तो वह तथ्य व प्रमाण दे पा रही है और न ही अपना दृष्टिकोण प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर पा रही है. कांग्रेस को यह समझना होगा कि सिर्फ आरोपों की सियासत से सत्ता हासिल करना आसान नहीं है. पर, इससे इतर भी कुछ जमीनी सच्चाइयों से अगर कांग्रेस जूझ रही है, तो भाजपा भी जूझ रही है. विश्व के सबसे बड़े संसदीय लोकतंत्र में 89.88 करोड़ मतदाता एक बार फिर ऐतिहासिक जनादेश के लिए 10 लाख मतदान केन्द्रों की  चौखट लांघने के उत्साह से भरे-पूरे नजर आ रहे हैं, तब कसौटी पर भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन तो कसे ही जाएंगे, शेष विपक्ष की मोर्चेबंदी की ताकत भी दांव पर लगनी तय है. महागठबंधन का विपक्षी राग बेसुरा हो चला है. ऐसे हालात में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर 2019 के चुनावी संग्राम का चरित्र क्या होगा? क्या वह 2014 की चुनावी जय-पराजय की पटकथा का विस्तार होगा या फिर एक नया अध्याय लिखा जाएगा? इस सवाल का जवाब तो भविष्य के गर्भ में है, और 23 मई 2019 को ईवीएम सबका जवाब देगी. पर सारा  देश इस चुनाव में दिलचस्पी ले रहा है. और सिर्फ देश ही नहीं, विश्व समुदाय भी न केवल इन चुनावों को लेकर उत्सुक है, बल्कि कुछेक देश तो इन चुनावी-नतीजों पर असर डालने वाले कारक बनने के लिए तैयार हैं. इसीलिए मैं इन चुनावी नतीजों को ऐतिहासिक जनादेश कह रहा हूं. इसकी दो वजहें और भी हैं. एक यह कि पिछले चुनाव में भाजपा-राजग ने 336 सीटें हासिल की थीं तो कांग्रेस-संप्रग ने महज 60 सीटें. शेष सीटें अन्य दलों व उम्मीदवारों के हिस्से गई थीं. इन्हीं आंकड़ों को विस्तार देकर सत्ता बचाने व हासिल करने पर जोर देकर चुनावी बिसात सजाई जा रही है. दूसरी वजह है मोदी, जो पिछले चुनाव के केन्द्र थे और इस बार के चुनाव में भी केन्द्र में हैं. फर्क है तो इतना कि पिछले बार संप्रग- शेष विपक्ष के लिए मोदी को रोकना मुख्य मुद्दा था तो इस बार मोदी को सत्ता से हटाना उनका एकमात्र लक्ष्य. इसके चलते विपक्षी एकता के लिए सियासी कवायद तो खूब हुई, पर मायावती, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, शीला दीक्षित, चंद्रबाबू नायडू जैसे कई क्षत्रपों की अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से ये कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाई हैं. इन सबने महागठबंधन का शोर तो खूब मचाया, पर अंततरू तस्वीर क्या पेश हो रही है? यदि यह माना जाए कि सियासी आपाधापी के इस दौर में कांग्रेस-संप्रग का वजूद ही दांव पर लगा हुआ है, तो आज की तारीख में यह आंकलन गलत नहीं कहा जा सकता. सबसे पुरानी पार्टी होने का ईगो कांग्रेस को झुकने नहीं  दे रहा है तो संप्रग का विस्तार कैसे होगा? इसके उलट भाजपा ने न केवल अपने नाराज सहयोगी दलों को मनाने के लिए खुद झुकना मंजूर किया, अपितु नए सहयोगी भी अपने साथ जोड़ लिए. तो तस्वीर के इस फ्रेम में कांग्रेस-संप्रग का चेहरा कैसे फिट हो पाएगा, यह तो देश के मतदाता ही बताएंगे. लेकिन आरोपों की धार चाहे जितनी तीखी हो जाए, चुनावी जीत के लिए जिस राजनीतिक समीकरण  और अंकगणित को साधा जाता है, भाजपा-राजग फिलहाल तो उसमें आगे हैं. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि इस बार के चुनाव में पूर्वोत्तर और पं. बंगाल, ओडि़शा आदि राज्यों की बड़ी भूमिका रहेगी. कभी कांग्रेस और वामदलों के रहे प. बंगाल में आज ममता बनर्जी की हुकूमत चल रही है पर भाजपा ने पिछले पांच वर्षों में वहां अपना जनाधार बढ़ाया है. पूर्वोत्तर में असम को छोड़कर कांग्रेस कहीं प्रभावी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाई। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में भाजपा की सत्ता से विदाई कांग्रेस का हौसला बढ़ा रही है. डेढ़-दो माह पहले तक इन नतीजों के परिप्रेक्ष्य में 2019 के चुनावी चित्र की जो रेखाएं खींची जा रही थीं उसमें भाजपा को क्षति हो रही थी और यह क्षति भाजपा कितना पाट सकेगी, यह देखना होगा. पर राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना यह भी है कि जरूरी नहीं कि विधानसभा के आधार पर लोकसभा चुनावों के खाके खींचकर नतीजों पर आया जाए। दरअसल, विधानसभा और लोकसभा चुनावों की स्थितियां भिन्न होती हैं. लोकसभा चुनावों में नेतृत्व सरकार का प्रदर्शन विश्वसनीयता, स्थिरता, आंतरिक-बाह्य सुरक्षा, विदेश नीति, वैश्विक परिदृश्य जैसे मुद्दों को तरजीह मिलती है. अब पिछले लगभग एक साल से जिन मुद्दों पर कांग्रेस- विपक्ष द्वारा मोदी सरकार को घेरा जा रहा था, पुलवामा आतंकी हमले व बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद अब मिशन शक्ति ने उन मुद्दों  को लगभग  गौण कर दिया और वायुसेना तथा इसरो-डीआरडीओ की कार्रवाई ने एक नए चुनावी धरातल की रचना कर दी है. अब अगर और कोई प्रतिकूल परिस्थिति नहीं हुई तो मौजूदा परिवेश ही चुनावी नतीजों की दिशा तय करेगा, यह माना जा सकता है विपक्ष ने आतंकी हमले और एयर स्ट्राइक को लेकर जिस तरह की बयानबाजी की, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को लेकर  जिस तरह का गैर-जिम्मेदाराना आचरण प्रस्तुत किया, वह भी देश के जनमानस को कदाचित रास नहीं आया है. ऐसे परिदृश्य में जिस मोदी-विरोध पर विपक्ष पूरी तरह केंद्रित है, विपक्ष अपनी संभावनाओं को कितना आकार दे पाएगा, यह सवाल अहम है.

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