नरेन्द्र कुमार वर्मा
(ब्यूरोचीफ, दिव्यदूत, नई दिल्ली)
नई दिल्ली २०/०१/ २०२४ /// अयोध्या में श्रीराम जन्म भूमि स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। इस स्थान को पाने के लिए हिंदू समाज ने 134 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। दशकों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद साल 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्थान को रामलला विराजमान की संपत्ति माना। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के कानूनी इतिहास को हम आपकी जानकारी के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की कानूनी लड़ाई का इतिहास काफी लंबा है। अंग्रेजी शासनकाल से लेकर देश की आजादी तक हिंदूपक्ष ने अपने अराध्यदेव की जन्मस्थली को लेकर लगातार कानूनी लड़ाई लड़ी। भारतीय न्याय व्यवस्था के अनुसार कानूनी लड़ाई को जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय में तीन स्तरों पर लड़ा गया। आज अयोध्या में रामलला का जो भव्य और दिव्य मंदिर बन रहा हैं। उसके पीछे हिंदू समाज ने दशकों तक कानूनी लड़ाई लड़ी। अदालत में कानूनी लड़ाई बहुत चुनौतीपूर्ण थी। मुगल शासनकाल में श्रीराम जन्म स्थान पर बने भव्य मंदिर को तोड़ कर वहां मस्जिद का निर्माण कर दिया गया था। मगर मुगल शासनकाल में भी हिंदू अपने परम अराध्यदेव के जन्मस्थान को पाने के लिए संघर्ष करता रहा।
1856-57 में मुगल शासनकाल के पतन के बाद अंग्रेजी शासनकाल के समय भारत में अदालतों का गठन हो चुका था। हिंदू समाज श्रीराम जन्मभूमि पर पूजा करने की इजाजत की मांग को लेकर पहली बार अदालत में पहुंचा। अदालत ने हिंदू समाज की अपील पर माना कि मस्जिद जिस स्थान पर है वहां श्रीराम के प्रतीक चिन्ह मौजूद है। लिहाजा अदालत ने विवादित स्थान को दो हिस्सों में बाट कर वहां तारों की एक बाड़ का निर्माण करा दिया जिसके एक हिस्से में हिंदूओं को पूजा और एक हिस्से में मुस्लिमों को नमाज की इजाजत दे दी गई। हिंदूओं ने नियमित तौर पर श्रीराम की पूजा भोज का क्रम शुरू कर दिया और वहां पूरे भक्तिभाव के साथ पूजापाठ होने लगा। मगर इस पर हिंदू समाज ने चुप बैठना स्वीकार नहीं किया वह कानूनी जानकारों और इतिहाकारों से बराबर संपर्क करने लगा। वह दौर अंग्रेजी शासन का था। अंग्रेजी शासन में बड़े अधिकारी या तो अंग्रेज होते थे या उनके चाटुकार मुस्लिम। इसलिए हर स्तर पर हिंदू पक्षकारों की दलीलों को अनसुना किया जा रहा था। मगर अयोध्या में मौजूद निर्मोही अखाड़े के मंहत रघुबर दास को श्रीराम जन्म भूमि पर संपूर्ण अधिकार के बिना चैन नहीं पड़ रहा था।

मंहत रघुबर दास जनवरी 1885 में विवादित स्थान के उस हिस्से पर पक्का मंदिर निर्माण करने की मांग को लेकर फैजाबाद की जिला अदालत जा पहुंचे। अदालत ने जब उनकी दलीलों और इतिहासिक प्रमाणों को देखा तो फैसला सुनाया कि हिंदू समुदाय को श्रीराम जन्म स्थान पर पूजा करने का पूरा अधिकार है। मगर वह फैजाबाद के जिला कलेक्टर के फैसले के खिलाफ वहां पर पक्का मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दे सकते। यह एक बिडंबना ही थी कि जिला जज सही फैसला देते हुए अंग्रेज कलेक्टर से डर रहे थे। 1934 में हिंदू समाज के अनेक साधु संतों, महात्माओं, सिखों और धर्म प्रेमियों ने विवादित स्थान पर मुस्लिमों को नमाज पढ़ने से रोक दिया। और देखते ही देखते विवादित स्थान पर बनी मस्जिद को तोड़ दिया। इस तरह पहली बार हिंदूओं ने विवादित गुंबदों को ढाह दिया था। अंग्रेजी सरकार ने फौरन पुलिस भेज कर स्थिति पर नियंत्रण किया और तोड़ी गई मस्जिद का पुर्ऩःनिर्माण करा कर मामले को शांत करा दिया।
यह वह दौर था जब अंग्रेजी शासन के खिलाफ हिंदू क्रांतिकारियों ने विद्रोह का बिगुल बजा रखा था। हिंदूओं को भारतभूमि पर अंग्रेजों का शासन स्वीकार नहीं था। लिहाजा अंग्रेजों के खिलाफ दो स्तर पर आंदोलन चल रहा था अयोध्या में श्रीराम जन्म स्थान को पाने की लड़ाई और अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेड़ने की मुहिम। अब तक अंग्रेजी हुकुमत भी समझ चुकी थी कि हिंदूओं के विरुध्द मुस्लिमों को खड़ा रखने के लिए इस स्थान की यथा स्थिति बनी रहनी चाहिए। 1947 में देश आजाद हो गया। हिंदूओं को लगा कि अब उनका शासन है। सत्ता में उनके पैरोकार बैठे है इसलिए अब श्रीराम जन्म भूमि की लड़ाई में उनके साथ न्याय होगा। मगर यह हिंदू समुदाय का कोरा भ्रम था। देश की आजादी के बाद सत्ता जिनके हाथों में आई उनका रुख तो इस मामले में अंग्रेजों से भी गया गुजरा था।
हिंदूओं की किसी भी बात और इतिहासिक प्रमाण को सरकार ने नहीं माना। हिंदू अपने अराध्य देव की पूजा और उनके मंदिर के निर्माण की मांग को लेकर सत्ताधारियों से मिलते रहे मगर कहीं से उन्हें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। भगवान श्रीराम भी हिंदूओं की सुनवाई न होने से दुखी थे। इसी बीच विवादित परिसर के गुबंद के नीचे एक बड़ी ईश्वरीय घटना हुई। यह घटना किसी चमत्कार से कम नहीं थी। 22 दिसंबर 1949 को ढांचे के ऊपर बने गुंबद के नीचे से भगवान श्रीराम की मूर्ति का प्रकटीकरण हुआ। देखते ही देखते यह खबर सारे भारत में फैल गई। धर्म प्रेमी अपने अराध्य देव के दर्शनों के लिए अयोध्या की तरफ दौड़ने लगे।
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सरकार और प्रशासन के अधिकारी यह देखकर कर चकित रह गए कि यह चमत्कार हुआ कैसे। बिना फर्श टूटे और बिना किसी मार्ग के मूर्ति गुंबद के भीतर कैसे पहुंची। सरकार के आदेश के बाद 29 दिसंबर 1949 को जिला प्रशासन ने सीआरपीसी की धारा 145 का इस्तेमाल करते हुए संपूर्ण विवादित क्षेत्र को अपने अधिकार में ले लिया और वहां पर पुलिस का पहरा बैठा दिया। इस घटना के 19 दिन बाद हिंदू महासभा के सक्रिय सदस्य गोपाल सिंह विशारद ने 16 जनवरी 1950 को फैजाबाद जिला अदालत में एक मुकदमा दायर किया। उनकी मांग थी कि गुंबद के नीचे प्रकट हुई मूर्तियों की पूजा अर्चना और भोज प्रसाद की उन्हें अनुमति दी जाए। इसके 11 माह बाद 5 दिसंबर 1950 को महंत रामचंद्र दास ने भी फैजाबाद सिविल अदालत में दूसरे पक्ष को पूजा अर्चना में बाधा डालने से रोकने की अपील दायर की।
3 मार्च 1951 को न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष को पूजा अर्चना में बाधा न डालने का कड़ा आदेश दिया। साल 1959 में निर्मोही अखाड़े ने एकबार फिर अदालत का रुख किया और दावा जताया कि संपूर्ण श्रीराम जन्मभूमि स्थान पर उनका अधिकार है। निर्मोही अखाड़े ने अदालत से कहा कि श्रीराम जन्मभूमि के रिसीवर प्रियदत्त राम को हटा कर उन्हें वहां पूजा की अनुमति दी जाए। हिंदूओं और मुस्लिमों के बीच यह कानूनी लड़ाई 1856-57 से शुरू हुई थी। जिसकी पैरोकारी स्थानिय मुस्लिम समाज कर रहा था। मगर एकाएक 18 दिसंबर 1961 को उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अदालत में एक वाद दायर करते हुए कहा कि यह जगह मुसलमानों की है। गुंबद के नीचे से मूर्तियों को हटा कर वह स्थान उन्हें दे दिया जाए। इस तरह पहली बार 1961 में मुस्लिमों के एक संगठन की इस प्रकरण में एंट्री हुई।
श्रीराम जन्मभूमि स्थान से हिंदूओ की अपार आस्था और श्रध्दा जुड़ी हुई थी। इसी आस्था को लेकर फैजाबाद के एक अधिवक्ता उमेश पांडे ने जिला न्यायधीश केएम पांडे के यहां एक अपील दायर कर दी कि गुंबद के भीतर ताला खोल कर उन्हें पूजा की अनुमति दी जाए। वह अपने अराध्य देव की बंद दरवाजे के बाहर से पूजा क्यों करें। अदालत ने उनके तर्कों को सुना और ताला खोल कर पूजा पाठ का आदेश दे दिया। मुस्लिम पक्ष इस आदेश के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के समक्ष पहुंचा मगर चंद ही दिनों में उनकी अपील खारिज हो गई।
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हर स्तर पर हिंदू पक्ष के साक्ष्य, तर्क और एतिहासिक प्रमाण इस बात के गवाह थे कि यह स्थान श्रीराम जन्मभूमि हैं। मगर जिला अदालत इस मुकदमें में साल-दर-साल कोई फैसला नहीं दे रही थी। आखिरकार इस मामले में स्वयं प्रभु श्रीराम ने कलयुग की अदालत का रुख किया। 10 जुलाई 1989 को रामलला विराजमान एवं विवादित स्थान ने एक वाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर किया। अपने जन्मस्थान की लड़ाई के लिए श्रीरामलला विराजमान के अदालत में लड़ाई लड़ने से देश का समस्त हिंदू समाज सुलग उठा। हिंदूओं को लगा कि भगवान स्वयं न्याय पाने के लिए अदालत में जा रहे है हिंदू देश का सारा हिंदू कुछ नहीं कर पा रहा है। आखिरकार 1992 में देश भर का हिंदू समाज अयोध्या में जुटने लगा और लाखों कारसेवकों की भीड़ ने 6 दिसंबर 1992 को श्रीरामजन्म भूमि के ऊपर बने गुंबद को ढहा दिया।
इस घटना के दो दिन बाद 8 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कर्फ्यू लगा दिया गया। इस घटना के बाद साल 1993 में उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के समक्ष एक याचिका दायर की गई। जिसमें कहा गया कि भगवान के लिए भोज और पूजा की अनुमति दी जाए। 1 जनवरी 1993 को उच्च न्यायालय के न्यायधीश हरिनाथ तिलहरी ने वहांदर्शन और पूजन की अनुमति दे दी। मगर 7 जनवरी 1993 को केंद्र सरकार ने समस्त 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर अपने कब्जे में ले लिया। अप्रैल 2002 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने विवादिक स्थल के मालिकाना हक को लेकर सुनवाई शुरू की। उच्च न्यायालय ने एतिहासिक साक्ष्य एकत्र करने की गरज से 5 मार्च 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को निर्देश दिया कि संबंधित स्थल की खुदाई कर एतिहासिक साक्ष्य एकत्र करें। 22 अगस्त 2003 को एएसआई ने जो रिपोर्ट और साक्ष्य उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए उनमे माना गया कि विवादित जमीन के नीचे विशाल हिंदू मंदिर का ढांचा मौजूद हैं।
दूसरी तरफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1989 से इस मामले की सुनवाई आरंभ की थी और इससे संबंधित समस्त दस्तावेजों को अपने पास मंगा लिया। आखिरकार 21 वर्ष बाद 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले में एक फैसला सुनाया। अदालत ने विवादित स्थल को तीन बराबर हिस्सों में बांटने की आदेश दिया और अपने फैसले में यह माना कि गुंबद के नीचे जहां मूर्तियां प्रकट हुईं थीं वह स्थान श्रीराम का जन्मस्थान हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायाय ने इस मामले की सुनवाई के दौरान 87 से ज्यादा गवाहों के बयान दर्ज किए जिन्हें 13 हजार से अधिक पृष्टों पर दर्ज किया गया। मुस्लिम पक्षकार इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले से संतुष्ट नहीं थे लिहाजा वह उसके फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में चले गए। जबकि हिंदूपक्षकारो का कहना था इस संपूर्ण जमीन पर रामलला विराजमान का अधिकार है इसलिए वह इस जमीन का कोई भी हिस्सा मुस्लिम पक्ष को दिए जाने के खिलाफ हैं।
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9 मई साल 2011 में श्रीराम जन्म भूमि मंदिर की लड़ाई सर्वोच्च न्यायालय पहुंची। सुप्रीम ने कहा कि जब तक इस मामले की सुनवाई पूरी नहीं होती इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसले पर रोक रहेगी और विवादित स्थल पर 1993 की यथा स्थिति बहाल रहेगी। इसी बीच 2015 में हिंदूपक्ष ने कहा कि उन्हें टेंट में बैठे रामलला के टेंट को बदलने की इजाजत दी जाए। 21 मार्च 2017 सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के बाद कहा कि इस मामले को आपसी सहमति से निपटा लेना चाहिए। जिसके बाद 20 नवंबर 2017 को उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने कहा सुप्रीम कोर्ट से कहा कि श्रीराम जी का मंदिर अयोध्या में और मस्जिद लखनऊ में बनाई जा सकती है। मगर दूसरे मुस्लिम संगठनों ने इस बात का विरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट ने देश के इस सर्वोधिक चर्चित मामले को सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ के हवाले कर दिया। जिसके बाद 13 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 20 जुलाई से इस मामले की लगातार सुनवाई होगी। 6 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला अब प्रतिदिन सुना जाएगा। और इस तरह 16 अक्टूबर 2019 को 40 दिन लगातार सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय इस मामले को लेकर अंतिम ऩिर्णय पर पहुंचा। 9 नवंबर 2019 को वह एतिहासिक दिन आ ही गया जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने श्रीराम जन्म भूमि पर अपना फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संबंधित स्थल श्रीराम जन्म भूमि स्थान है इसलिए 2.77 एकड़ भूमि रामलला विराजमान के स्वामित्व की रहेगी। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े और सुन्नी वक्प बोर्ड के दावे को सिरे से खारिज कर दिया। इस तरह दशकों तक चली कानूनी लड़ाई का अंत 134 साल बाद हो पाया।




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