नरेन्द्र कुमार वर्मा
नई दिल्ली// 23/11/2023/// उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने खान-पान और ब्यूटी प्रोडक्ट्स पर अवैध रूप से हलाल सर्टिफिकेट देने के धंधे पर प्रतिबंध लगा कर उसे संज्ञेय अपराध घोषित कर दिया है। योगी सरकार के इस आदेश के बाद प्रदेश में हलाल सर्टिफाइड प्रोडक्टस के निर्माण, बिक्री और भंडारण को अवैध घोषित कर दिया गया है। योगी आदित्यनाथ सरकार के इस कदम के बाद देश में एकबार फिर हलाल सर्टिफिकेशन पर बड़े सवाल खड़े हो गए है। दरअसल कांग्रेस के शासन के समय कुछ मुस्लिम संगठनों ने मिलकर गैरकानूनी तरीके से देश में विभिन्न सामान का उत्पादन करने वाली कंपनियों को हलाल सर्टिफिकेशन लेने को मजबूर कर दिया था। 1974 से देश में इस तरह की व्यवस्था सरकार के समांतर चलाई जा रही थी और सरकारी अधिकारियों के बार-बार सचेत करने के भी सरकार ने आंख मूंद रखी थी। बीते एक दशक के दौरान हलाल सर्टिफिकेशन चर्चा का विषय बना रहा। वास्तव में भारत में इस तरह का यह पहला मामला है जब कोई निजी धार्मिक संगठन विभिन्न उत्पादनों का निर्माण करने वाली कंपनियों को पैसा लेकर हलाल सर्टिफिकेट बांट रहा है।

योगी आदित्यनाथ सरकार को काफी पहले इस बात के संकेत मिले थे कि हलाल सर्टिफिकेशन का धंधा करने वाले मुस्लिम संगठन इससे प्राप्त पैसों का उपयोग आतंकवादियों की मदद के लिए कर रहे है। हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड चेन्नई, जमीयत उलेमा हिंद हलाल ट्रस्ट दिल्ली, हलाल काउंसिल ऑफ इंडिया मुंबई, और जमीनय उलेमा महाराष्ट्र व्दारा हलाल सर्टिफिकेशन जारी किया जाता है। दिलचस्प बात यह हैं कि इन मुस्लिम संगठनों के पास डेयरी उत्पादनों, कपड़ा, चीनी, नमकीन, मसाले, सौदर्य प्रसाधन, चाकलेट, मिठाई, आटा, दाल, चावल इत्यादि उत्पादनों की जांच करने वाली कोई मशीनरी नहीं है। इन संगठनों के पास न तो एक्सपर्ट है, न ही कोई प्रयोगशाला है और न कोई अंतरराष्ट्रीय मानक है। मगर इन संगठनों ने हलाल सर्टिफिकेशन के माध्यम से अरबों रूपयों की फीस वसूली का काम किया।
दरअसल हलाल अरबी भाषा का एक शब्द है। इस्लामी शरीयत के मुताबिक इसका अर्थ है कि मुसलमान ऐसा काम करे जो हलाल हो हराम न हो। हलाल का सीधा अर्थ है जायज और हराम का अर्थ है वर्जित। देश के मुस्लिम संगठनों ने मिलकर इस योजना पर काम किया और बिना किसी कानून के देशभर की कंपनियों को इस तरह के सर्टिफिकेट बांटने शुरू कर दिए कि वह जो उत्पादन बना रही है वह हलाल है। देश में विभिन्न खाद्य उत्पादनों का निर्माण करने वाली कंपनियों को भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) से प्रमाण-पत्र लेना अनिवार्य है। एफएसएसएआई भारत सरकार की संस्था है जिसके पास अपना नेटवर्क एवं वैज्ञानिक तंत्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रयोगशालाएं है। जबकि धर्म के नाम पर देश में खान-पान एवं सौदर्य प्रसाधन के उत्पादनों को सर्टिफिकेशन देने का अधिकार किसी धार्मिक संगठन को नहीं है।
दरअसल पिछले काफी दिनों से जमीयत उलेमा-ए-हिंद देश की विभिन्न अदालतों से सजा पाए आतंकवादियों के मुकदमे बड़ी अदालतों में लड़ने का काम कर रही है। इस सारी कवायद में बड़े बड़े वकीलों को भारी-भरकम पैसा मिल रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार के पास इस बात के इनपुट थे कि हलाल सर्टिफिकेशन का धंधा करने वाले संगठनों व्दारा आतंकवादी संगठनों और प्रतिबंधित पीएफआई की भी मदद की जा रही है। सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने हलाल सर्टिफिकेशन करने वालों को खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक की है।

एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में काम करने वाली 400 एफएमसीजी कंपनियों ने अपने 3200 उत्पादनों पर हलाल सर्टिफिकेशन लिया हुआ है। इतना ही नहीं पांच सितारा होटल, रेस्टोरेंट और विमानन कंपनियां, ऑन लाइन फूड चेन चलाने वाले स्विगी-जोमेटो भी हलाल सर्टिफाइड है। सरकार का कहना है हलाल सर्टिफिकेशन देने वाले संगठन 26 हजार से लेकर 60 हजार तक एक मुश्त फीस वसूली करते हैं। इसके अतिरिक्त कंपनी के प्रत्येक उत्पादन पर 1500 रुपये लिए जाते है। सर्टिफिकेशन के नवीनीकरण के समय 40 हजार से लेकर 2 लाख रुपये वसूले जाते है।
भारत में केंद्र सरकार की नाक के नीचे सरकार के सामांतर धार्मिक संस्थाओं व्दारा हलाल सर्टिफिकेट बांटा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील शशांक देव सुधी कहते हैं कि जिस तरह से मुस्लिम संगठन हलाल सर्टिफिकेट बांट रहे हैं अगर सिखों की सर्वोच्च संस्था अकाल तख्त और ईसाईयों को धर्म गुरु पोप और बौध्दों के धर्म गुरु भी अपने-अपने समुदाय के लिए प्रमाण-पत्र जारी करने लगेंगे तो क्या होगा। इसका अर्थ साफ है कि देश की सरकारी संस्थाओं आईएसआई और एफएसएसएआई के प्रमाण-पत्र दो कौडी के है। केवल हलाल सर्टिफिकेशन ही प्रमाणिक है। भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में किसी धार्मिक संगठन के प्रमाण-पत्रों को इस तरह से देश की 85 फीसदी आबादी पर थोपा जा रहा है इस तरह की मिसाल दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलती।
वास्तव में भारत में हलाल सर्टिफिकेट का जरूरत मीट का निर्यात करने वाले कारोबारियों को पड़ती है। जिसके लिए विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने भारतीय अनुरूपता मूल्यांकन योजना (आईसीएएस) के तहत राष्ट्रीय प्रमाणन निकाय प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीसीबी) नामक सरकारी बॉडी का गठन कर रखा है। इसके निर्देशों का पालन करने के बाद ही मीट निर्यात की अनुमति मिलती है। देश में प्रचुर मात्रा में प्रचलित अन्य उत्पादनों पर हलाल सर्टिफिकेशन की जरूरत कोई मायने नहीं रखती। मगर बड़ी चतुराई के साथ मुस्लिम संगठनों ने देश में वेज और ऩॉन वेज प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियों पर हलाल सर्टिफिकेशन थोपना शुरू कर दिया। मजेदार बात तो यह हैं कि इस धंधे में लगे मुस्लिम संगठनों व्दारा कपड़े तक को हलाल सर्टिफाइड किया जा रहा है। विश्व हिंदू परिषद के नीरज दौनेरिया कहते है योगी सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा कर बहुत ही साहसिक काम किया है। उत्तर प्रदेश में हलाल सर्टिफिकेट जारी करने वाले संगठनों की जांच अब एसआईटी के हवाले कर दी गई है। एसआईटी इसकी अवैध कमाई, आतंकवादी गतिविधियों की फंडिंग, राष्ट्र विरोधी संगठनों के साथ उनकी मिलीभगत जैसे कई मुद्दों की जांच करेगी। खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 की धारा 89 भी इस तरह के सर्टिफिकेशन को अवैध मानती है। अधिनियम की धारा 52 इसे दंडनीय अपराध कहती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)




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