रायपुर15/11/2023/// छत्तीसगढ़ विधानसभा के दूसरे चरण की 70 सीटों पर आज शाम 5:00 बजे शोरगुल प्रचार थम गया है पूरे दिन भाजपा और कांग्रेस के दिग्गजों ने एक-एक मिनट का उपयोग करते हुए आम जनता और मतदाताओं से रैली के रूप में तो कहीं सभा के रूप में जन संपर्क स्थापित किया 5:00 बजे -होते ही पूरे प्रदेश में बची 70 विधानसभा सीटों पर शोरगुल चुनाव प्रचार बंद होगया अब मतदान के दिन तक प्रत्याशी चार की संख्या में घर-घर जाकर मतदाताओं से रूबरू होकर संपर्क कर सकते हैं और वोट देने की अपील कर सकते हैं शोरगुल समाप्त होने की परंपरा चुनाव आयोग द्वारा बहुत पुरानी परंपरा है
अब बचे हुए 16 और 17 तारिक की रात मतदाता के घर-घर जाकर प्रचार करने के इस वक्त का मतदाता बेसब्री से इंतजार करते हैं इस पल का झोपड़पट्टी और बस्ती के मतदाता बड़ी ही बेसब्री से इंतजार करते हैं कारन साफ है की हर चुनाव में वहां लालच की बड़ी नदी बहती है जिसमें शराब सबसे प्रमुख है इसके बाद साड़ी है किचन के समान है ऐसी चीजों का बड़ा बोल वाला होता है जो मतदाताओं के घर उम्मीदवार अपने-अपने माध्यम से अपने-अपने गुर्गों के जरिये छुड़वायाता है
चुनाव आयोग पूरी सतर्कता का बहुत बढ़िया अभिनय करता है उसे पता है कि कहां पर किस बस्ती में कौन नेता क्या प्रलोभन दे रहा है लेकिन वह पता नहीं का अभिनय कर शांतिपूर्वक मतदान को निपटने की अपील करता है
आज चुनाव इतने महंगे क्यों हो गए हैं हमारी टीम हर बार इन बस्तियों में सर्व करती है इस बार दोनों ही बड़े दलों द्वारा सरकारी खजाने से वोट ख़रीदने के प्रलोभावन के अलावा नगद, शराब. साडी का प्रलोभन इन्हीं दो रातों में दिया जाता है आज बाजार में यह आम चर्चा है कि इन बस्तियों में झोपड़पत्तियों में जहां पर थोक में मतदाता रहते हैं एक एक घर की ताज़ी रिपोर्ट उम्मीदवार को रहती है इन इलाकों में आज वोट की कीमत 1000 से लेकर 15 सो रुपए तक की अंकी गई है इतना पैसा बस्तियों में हर वोटर को दोनों पार्टियों देती हैं इसलिए पिछले 7 दिनों में दीपावली के पहले से ही इन झोपड़पत्तियों में रहने वाली काम करने वाली बईयाँ और लोकल मजदूर सारे के सारे इन्हींनेताओं के झंडा बैनर उठाकर नगद पैसे का लाभ ले रहे हैं दिन भर झंडा उठाने का महिला का पेमेंट ₹500 है पुरुष का पेमेंट ₹700 यह रेट है यह आम जग जाहिर है चुनाव आयोग आंख खोलकर इन झंडा वंदन वालों को देखता रहता है और चुनाव शांतिपूर्वक हों इसका अभिनय करते हुए लोकतंत्र की बची-खुची इज्जत को ढके रहता है




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