दीवाली पर सरकार हर बार पटाखों की दुकानों पर ताला जड़ देती है। दीवाली पर आतिशबाजी को लेकर न्यायालय ने भी पाबंदी लगा रखी है। न्यायालय में जाने वाले एक्टिविस्ट कहते हैं कि त्योहरों पर होने वाली आतिशबाजी से पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। लेकिन विडंबना यह हैं कि नववर्ष और क्रिसमस पर तो पटाखे चलाना ठीक है, शब-ए-बारात में पटाखे चलाने का चलन है, शादी विवाह में जोरदार आतिशबाजी भी उचित है मगर दीवाली पर पटाखे चलाना प्रतिबंधित है। यह तर्क ठीक उस तरह है जैसे होली पर पानी और रंगों का इस्तेमाल न करने की सलाह देना। एक बात समझ से बाहर है कि बात-बात पर हिंदूओं के त्योहारों पर ज्ञान देने वाले तब ज्ञान क्यों नहीं देते जब बकरीद पर जानवरों की कर्बानी के बाद करोड़ो गैलन पानी उसकी सफाई में बहा दिया जाता है। यह सारे नाटक और तर्क केवल हिंदूओं के त्योहारों के लिए ही है।

हिंदू संस्कृति में पटाखों और आतिशबाजी का परंपरा सदियों से रही है। दरअसल भारत की प्राचीन परंपरा को वामपंथी विचारकों व्दारा दशकों से गहरी चोट पहुंचाने का काम किया जा रहा है। तीज त्योहारों के समय यह काम और तेजी के साथ किया जाता है। भारत में तो विजयनगर, कश्मीर और ओडिशा के गजपति शासकों के समय में भी आतिशबाजी का प्रचलन था। स्कन्दपुराण, पद्मपुराण और भविष्य पुराण में जिस दीपवृक्ष का उल्लेख मिलता है। विव्दान उसे आतिशबाजी से बना दीपवृक्ष मानते हैं। ऐसी मान्यता हैं कि दीपवृक्ष प्रज्ज्वलित करने से बुरी आसुरी शक्तियां भाग जाती थी। यहां यह बात भी विचारणीय हैं कि अगर भारत में आतिशबाजी और पटाखों की परंपरा नहीं होती तो कबीर उसका उल्लेख क्यों करते। कबीर दास जी ने लिखा है “या तन की बारूद बनी है, सत्तनाम की तोप, मारा गोला भरमगढ़ टूटा, जीत लिया जमलोक ” इसका अर्थ साफ है बारूद का भारतीय सभ्यता के साथ प्राचीन काल से ही रिश्ता रहा है।
आर्चाय चाणक्य के व्दारा रचित अर्थशास्त्र में एक ऐसे मिश्रण का विवरण है जो बहुत तेजी के साथ जलता है, तेज बड़ी-बड़ी लपटें पैदा करता है। यदि उसे किसी नालिका में भर दिया जाए तो वह तेज आवाज वाला पटाखा बन जाता है। जो लोग यह भ्रम फैलाने की कोशिश करते हैं पटाखा मुगल आक्रांता अपने साथ भारत लेकर आए थे। दरअसल उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं हैं कि बारुद का प्रयोग तो भारत में सदियों से होता आ रहा है। अब जो लोग पटाखा या आतिशबाजी को चीन या मुगलों से जोड़ते है उन्हें अपने दृष्टिदोष की जांच करवा लेनी चाहिए। जिस बारूद को यूरोप में तेरहवीं सदी में खोजा गया था वह भारत में सदियों पूर्व अग्निचूर्ण नाम से प्रचलित था जिसे गंधक, कोयला और अन्य मिश्रण से बनाया जाता था। 12 वीं शताब्दी में बौध्दधर्म से जुड़े एक बंगाली धर्मगुरु दीपांकर ने भी अपने समय में आतिशबाजी को प्रचलित बताया था। प्राचीन काल में भारत में गंधक और कोयले के एक मिश्रण से पटाखे तैयार किए जाने का उल्लेख मिलता है। मंदिरों में बुरी शक्तियों को भगाने के लिए भी आतिशबाजी का प्रयोग किया जाता था।
देश में ऐसी कोई साइंटिफिक स्टडी नहीं है जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि दीवाली पर पटाखों से प्रदूषण का स्तर बढ़ता है। यह केवल एक वैचारिक प्रदूषण है इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। पटाखों पर प्रतिबंध लगाना समाधान नहीं है। अगर ऐसा होता तो चीन, जर्मनी, इटली, अमेरिका में पटाखों का इस्तेमाल बंद कर दिया जाता। ब्रिटेन में तो महाराजा जार्ज पंचम अपनी हर विजय के बाद आतिशबाजी का आनंद लेते थे। भारत सरकार की संस्था आतिशबाजी अनुसंधान और विकास केंद्र (एफआरडीसी) ने देश में पर्यावरण के अनुकूल पटाखे तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके बाद भी पटाखों की बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध लगाना कहां तक उचित है। जबकि होना तो यह चाहिए था कि पर्यावरण के अनुकूल पटाखों की बिक्री को सरकार व्दारा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए था।
पटाखों से पर्यावरण प्रदूषण और शोर की बात करने वाले ज्ञानचंदों को इस बात की जानकारी नहीं है कि पटाखों से निकले बारूद से डेंगू और चिकनगुनिया जैसे घातक मच्छर तेजी से खत्म होते है। जिन लोगों को ओजोन की परत की चिंता दीवाली पर ही सताती है उन लोगों को अपने घरों से एसी निकाल कर फेंक देना चाहिए। दीवाली पर चलने वाले पटाखों की महक से वायुमंडल में घूमने वाले हानिकारक कीडे जो स्वास्थ्य से लेकर हमारी फसलों तक को नुकसान पहुंचाते है। वह बारुद की महक से मर जाते है। मगर पॉल्यूशन का सॉल्यूशन ढ़ूंढने वालों को लगता हैं कि दीवाली पर चलने वाला पटाखा ही पर्यावरण का असली गुनहगार है।
तमिलनाडु के मदुरई शहर में शिवकाशी नामक नगर में देश के 90 फीसदी पटाखे बनाए जाते हैं। करीब 20 लाख परिवार इस कारोबार से जुड़े है। यहां 2 हजार से ज्यादा छोटी-बड़ी पटाखा फैक्ट्री है। प्रतिवर्ष 6000 हजार करोड़ रुपये का टर्न ओवर शिवकाशी पटाखा नगरी से होता था। मगर प्रतिबंध के चलते आज अधिकांश फैक्ट्री बंद हो रही है। और कामगारों के सामने रोजी-रोटी का भारी समस्या खड़ी है। न्यायालय के प्रतिबंध लगाने के बाद चार महिने तक शिवकाशी बंद रहा था। यहां फैक्ट्री मालिकों का कहना हैं कि ग्रीन पटाखा बनाना बेहद महंगा है और उसमे वैरायटी भी सीमित है।




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