दिव्य-दूत

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हिंदू समाज के लोकनायक थे श्रीमंत संत शंकर देव

Anil Choubey 24-10-2023 15:42:05


संत शंकर देव जयंती 24 अक्टूबर पर विशेष

-नरेन्द्र कुमार वर्मा

 सदियों से सतातन धर्म बहुत उदार और सुधारवादी रहा है। सनातन धर्म में ऐसी बहुत सी विभूतियां हुई हैं। ऐसे महान लोगों ने हिंदू धर्म में फैली कुरितियों के खिलाफ आवाज उठाई और उन्हें दूर करने का काम किया। महान संत और दिव्य विभूति संत शंकर देव सनातन धर्म के तपस्वी और उपासक थे। पूर्वोत्तर भारत खासतौर पर असम, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में वैष्णव हिंदू धर्म और संस्कृति के सरंक्षण में संत शंकर देव ने संपूर्ण जीवन लगा दिया था। संत शंकर देव ने सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया और सनातन धर्म की कुरितियों के खिलाफ सारे भारत में अभियान चलाया। 1481 से लेकर 1493 कर वह भारत के हर तीर्थ स्थान पर गए और देश के सभी प्रमुख राजदरबारों में जाकर अपनी विव्दानता का परिचय दिया। संत शंकर देव ने हिंदू समाज में फैली ऊंच-नीच, छोटे बड़े, जाति-पंथ और कर्मकांडों का विरोध किया और सारे हिंदू समाज को श्रीराम और श्रीकृष्ण के संदेश पर चलने की सीख दी।

संत शंकरदेव एक दिव्य विभूति थे उन्होंने नव वैष्णव हिंदू धर्म का मार्ग प्रस्तुत कर भक्ति का एक ऐसा रास्ता दिखाया जो कुछ हाथों से निकल कर समाज में सर्वव्याप्त हो गया। असम में नवगांव जिले का बोरदोवा इलाका संत शंकर देव की कर्मस्थली रहा जहां से उनकी शिक्षाएं और संदेश सारे भारत में फैले। संत शंकर देव का पृथ्वी पर आगमन उस समय हुआ जब हिंदू समाज को किसी समाज सुधारक महापुरुष की सबसे ज्यादा आवश्यकता थी। उस समय भारत में आक्रांताओं का शासन था और सारे देश में जगह-जगह सामाजिक और धार्मिक वातावरण बेहद खराब होता जा रहा था। हिंदू समाज कर्मकांड में डूबा था और ऊंच-नीच का मतभेद चरम पर था। ऐसे समय में शंकर देव ने किसी दिव्य महापुरुष की भांति हिंदू समाज में जन-जागरण अभियान का आरंभ किया। केवल 32 वर्ष की अवस्था तक उनकी ख्याति चारों तरफ फैल चुकी थी। भारत की आध्यात्मिक परंपरा और धार्मिक वातावरण को जानने के लिए उन्होंने हिंदू समाज के सारे तीर्थ स्थानों पर जाकर वहां पुरोहितों और विव्दानो से साक्षात्कार किया। उन्होंने हिंदू समाज के लोगों से कहा कि केवल श्रीमदभागवत और रामायण को ही एक चौकी पर स्थापित कर भक्ति की जा सकती है। मंदिर की मूर्तियों में जो ईश्वर दिखाई देता हैं वह इन पवित्र ग्रंथों के हर श्लोक में निहित हैं।

धीरे-धीरे संत शंकर देव के अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी और लोग उनके व्दारा रचित भक्ति गीतों को गाने लगे। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के गीतों पर प्रसाद, कालिदमन, केलिगोपाल, रुक्मिणी-हरण, पारिजात-हरण, राम विजय, भक्ति प्रदीप, विप्रपत्नीप्रसाद, कीर्तनघोषा, अमृतमंथन, आदिदशम एवं हरिशचंद्र उपाख्यान जैसे ग्रंथों की रचना की। संत शंकर देव ने वेद उपनिषद और संस्कृत के व्याकरण कोष का भी गहन अध्ययन किया। शंकर देव ने अपनी रचनाओं में श्रीकृष्ण भगवान की भक्ति का बहुत सुंदर ढ़ंग से वर्णन किया और सामाजिक कुरितियों की जड़ों पर प्रहार करते हुए उन्हें हिंदू समाज के लिए अभिशाप बताया। शंकर देव हिंदू समाज के ऐसे लोक नायक थे जिनके अंदर नाट्यकार, गायक, नर्तक, समाज सुधारक, कवि और महान आध्यात्मिक संत के सभी गुण विद्यमान थे। संत शंकर देव का जन्म 1449 में असम के नवगांव जिले के बोरदोवा क्षेत्र के अलीपुखुरी गांव में हुआ था। बचपन में ही उनकी माता सत्य संध्या का साया उनके सिर से उठ गया। माता के निधन के थोड़े समय बाद ही उनके पिता भी इस दुनिया से चले गए। तब दादा और दादी ने उनका पालन-पोषण किया।

17 वर्ष की आयु में उन्होंने सभी विषयों का गहन अध्ययन कर लिया था। वह पढ़ाई में इतने कुशल थे कि उनकी बुध्दिमत्ता और प्रतिभा से शिक्षक भी दंग रह जाते थे। अध्ययन पूरा करने के बाद उनके दादा जी ने उनका विवाह सूर्यवती नामक कन्या के साथ कर दिया। मगर एक बेटी को जन्म देने के बाद उनकी धर्मपत्नी सूर्यवती भी इस संसार को छोड़ कर चली गईं। पत्नी के निधन से शंकर देव बहुत दुखी हुए और उन्हें समाज से विरक्ति हो गई। वह भारत भ्रमण पर निकल गए। कई वर्षों की आध्यात्मिक यात्रा के बाद वह वापस लौटे और कर्मकांडों के खिलाफ समाज को एकजुट करने लगे। पंडितों ने जब उनका यह आचरण देखा तो उन्होंने दिहिगिया राजा के दरबार में जाकर कहां कि शंकर देव कर्मकांड और हिंदू धर्म के खिलाफ वेदविरुध्द आचरण कर रहे हैं। मगर राजा के दरबार में जाकर उन्होंने जब अपने तर्क रखे तो राजा ने आसन से उठ कर उनका स्वागत किया और समाज को जाग्रत करने का आदेश दिया।

54 वर्ष की उम्र में उन्होंने कालिंदी नामक स्त्री के साथ दूसरा विवाह किया। 97 वर्ष की उम्र में भी वह अपने योग ध्यान और आध्यात्म के बल पर पूरी तरह से स्वस्थ्य और सक्रिय थे। इतनी ज्यादा उम्र होने के बाद भी वह दूसरी बार भारत के तीर्थों की यात्रा पर निकल पड़े। कई ऋषि, संत, तपस्वीयों और साधुओं से मिलने के बाद वह वापस असम लौटे और माजुली व्दीप को अपना डेरा बनाया। संत शंकर देव भारतीय गृहस्थ परंपरा के संत थे। उनका कहना था कि गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता था। उन्होंने जीवनभर लोगों को अशिक्षा, कर्मकांड और अंधविश्वास से दूर रहने की शिक्षा दी। उनका कहना था कि मूर्ति पूजा से अधिक भगवान के नाम का जाप करना चाहिए। बोरदोवा में संत शंकर देव जी का एक वैष्णव मठ है जिसे कीर्तनघर कहा जाता है। यहां एक पत्थर की शिला पर उनके पदचिन्ह अंकित हैं। होली के अवसर पर यहां विशेष आयोजन किया जाता है और लोग श्रीमंत शंकरदेव का आशीर्वाद प्राप्त करने यहां पहुंचते हैं। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि वैष्णन मठ में केवल श्रीमदभागवत की प्रति रखी जाएगी और उसकी की आराधना होगी। उनके बाद उनके शिष्यों ने मठ में उनके व्दारा रचित भक्तिगीतों की काव्यधारा कीर्तनघोषा की प्रति को भी रखना आरंभ कर दिया। भारत के पूर्वोत्तर के इलाकों में सनातन धर्म की संस्कृति, सामाजिक उन्नयन, भक्ति और जन-जागरुकता का प्रसार संत शंकर देव के कारण ही संभव हो पाया।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

 

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