-नरेन्द्र कुमार वर्मा
(नई दिल्ली ब्यूरोचीफ)
नई दिल्ली 18/10/2023/// समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट ने एतिहासिक फैसला दिया है। अदालत ने कहा कि भारत में समलैंगिक विवाह को वह मंजूरी नहीं दे सकती। सर्वोच्च अदालत का यह फैसला भारतीय समाज, भारतीयता और सनातन परंपराओं के अनुकूल है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा हैं कि यह देश की संसद का काम है कि वह अगर चाहे तो इस विषय पर कानून बना सकती है।

दरअसल देश में एक लंबे समय से एलजीबीटीकयू समुदाय से जुड़े लोग अपने संबंधों को कानूनी मान्यता देने के लिए लड़ाई लड़ रहे थे। पश्चिम जगत की यह अवधारणा भारतीय समाज को भी प्रभावित कर रही थी। इस समुदाय में लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वियर शामिल है। डॉक्टरी भाषा में अगर कहे तो इस दुनिया में एक वर्ग ऐसे लोगों का भी है जो अपने शरीर की पहचान तय नहीं कर पाते उन्हें अपने ही लिंग के व्यक्ति के प्रति आकर्षण की भावना रहती है। भारतीय समाज में इस विषय को बहुत जटिलता के साथ देखा जाता है। यह प्रवृत्ति किसी भी शरीर मे जन्मजात होती है। परिवार के शेष लोगों के साथ ऐसे लोग अपने को जोड़ कर नहीं रख पाते। भारतीय समाज में समलैंगिक रिश्तों को अनैतिक माना जाता है। मगर कानून कहता हैं कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता का यह अधिकार है मगर इनके विवाह को कानूनी रुप से वैध नहीं ठहराया जा सकता। भारतीय समाज में रहने वाले प्रत्येक धार्मिक समुदाय के व्यक्ति को किसी भी महिला से विवाह का अधिकार प्राप्त है। विवाह को भारत में एक सामाजिक संस्कार माना जाता है।
दरअसल दुनियाभर में इस तरह की श्रेणी के लोगों की डॉक्टरी भाषा में 72 श्रेणियां है जिन्हें चिकित्सकों के नजरिए से मानसिक विकार कहा जाता है। ऐसा माना जाता हैं कि समलैंगिक विवाह दुनियाभर में केवल एक अभिजात्य शहरी वर्ग की अवधारणा और विचार है। इस तरह के विवाह को मान्यता देने का अर्थ समाज में अनेक तरह की विसंगितयों को निमंत्रण देना है। समलैंगिक विवाह के बाद सामाजिक दायरे का लाभ, बैंक में ज्वाइंट खाता, स्कूल में एडमिशन अथवा बीमा में नामांकन जैसे विषय जटिल हो जाएंगे। इस तरह के विवाह को मान्यता देने का अर्थ हैं सीआरपीसी के 28 कानून और संविधान के 158 प्रावधान समाप्त हो जाएंगे। साथ ही कुछ महत्वपूर्ण अन्य कानून जैसे गोद, मेंटनेंस, तलाक और विरासत से संबंधित कानून असंगत हो जाएंगे।
भारत जैसे विकट सामाजिक परिवेश वाले देश में एडॉप्शन, सरोगेसी, अंतरराज्यीय उत्तराधिकार,टैक्स छूट,कर में कटौती,अनुकंपा के मुताबिक नौकरी जैसे विषयों का लाभ लेने के लिए विधि पूर्वक विवाह की ही जरूरत होती है। सनातन धर्म में विवाह पवित्रता, स्वायत्तता, पसंद और निजता का अधिकार और संस्कार है। सनातन धर्म में विवाह एक पुरूष और महिला के बीच बॉयोलॉजिकल रिश्ता होता है। देश में प्रचलित धर्म, कानून और रीतिरिवाज भी इस तरह के विवाह की अनुमति नहीं देते। इस तरह के विवाह से परिवार की अवधारणा खंडित हो जाएगी और प्रजनन नहीं हो सकेगा। समाज में मातृत्व की अवधारणा का ह्रास होगा। अभी तक भारत में इस तरह के विवाहित जोड़े को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। और उनका सामाजिक दायरा बेहद सिमट कर रह जाता है।




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