-नरेन्द्र कुमार वर्मा
पंडित दीनदयाल उपाध्याय दुनिया के ऐसे पहले चिंतक थे जिन्होंने मानव कल्याण के लिए 1964 में एकात्म मानव विकास का प्रतिपादन किया था। दीनदयाल उपाध्याय व्दारा प्रतिपादित यह सिध्दांत मानव जीवन के संपूर्ण कल्याण का समर्थन करता है। समान रुप से लोकतंत्र, धर्म, मानवाधिकार, राजनीति, शिक्षा और औद्योगिकरण की नई अवधारणा को उन्होंने दुनिया के सामने रखा एक नए ढ़ंग से प्रस्तुत किया। पहली बार दीनदयाल उपाध्याय ने बताया कि अगर उभोक्तावाद और औद्योगिकरण को नियंत्रित नहीं किया गया तो उसका सामवेशी विकास समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाएगा। पहली बार उन्होंने दुनिया को बताया कि राजनीति को समाज की तरफ मोड़ने से ही राष्ट्र का विकास होगा और नागरिकों की उसमें ज्यादा से ज्यादा भागिदारी होगी।

दुनियाभर में समाजवाद और साम्यवाद की चर्चा बहुत जोरशोर से होती है। व्यावहारिक दृष्टिकोण से आज सारी दुनिया साम्यवाद और समाजवाद से बहुत आगे निकल गई है। दीन दयाल जी का मानना था कि सरकारों को व्यापारिक कामों से अपने को मुक्त रखना चाहिए। क्योंकि अगर सरकार व्यापारी की तरह व्यवहार करने लगेगी तो अन्त्योदय की कल्पना कभी साकार नहीं हो पाएगी। देश कैसे संपन्न हो इसी थ्योरी पर उनका एकात्म मानव दर्शन केंद्रीत हैं। उन्होंने जिस एकात्म दर्शन की बात कहीं थी वह आज भारत ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। दरअसल पंडित दीन दयाल उपाध्याय स्वभाव से एक बड़े दार्शनिक और चिंतक थे। उनका एकात्म चिंतन हमारे वेदों-उपनिषदों में दिखाई देता है, जैन और बौध्द दर्शन में भी वह समाहित है। सिख ग्रंथ भी उसी की बात करते हैं। गरीबी, कृषि पर निर्भरता, उद्योग-धंधों का अभाव, शिक्षा की कमी, पारंपरिक हस्तशिल्प का समाप्त हो जाना, ग्राम आधारित काम धंधे बंद हो जाना और पश्चिम जगत पर निर्भर रहकर हम विकास नहीं कर सकते। पंडित जी इस थ्योरी के सख्त खिलाफ थे कि जो कमाएगा वहीं खाएगा।यह धारणा समस्त दीन दुखियों के खिलाफ है। उनका स्पष्ट मत था कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और वैश्विक विकास तभी संभव है जब हम एकात्म दर्शन को प्रोत्साहित करने का काम करेंगे।
बीसवीं सदी के महान विचारक दीनदयाल उपाध्याय ने पूंजीवाद और समाजवाद की अवधारणा को मानव विकास के लिए अभिशाप माना था। पूंजीवाद मानव को एक आर्थिक इकाई से ज्यादा नहीं मानता और साम्यवाद मानव को एक राजनीतिक इकाई मानता हैं। जबकि पंडित जी का एकात्म दर्शन मानव से परिवार, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से मानव कल्याण की बात को समग्र रुप से दुनिया के सामने रखता है। अगर हम आज के भारत की परिस्थितियों की बात करें तो राजनीति, अर्थव्यवस्था, उद्योग, शिक्षा, प्रशासन, समाज और व्यावहारिक दृष्टिकोण से सरकारी योजनाओं में एकात्म दर्शन साफ दिखाई देता है। कौशल विकास, ओडीओपी, स्टार्ट-अप, मुद्रा ऋण, ग्राम ज्योति योजना, आदर्श ग्राम, मेक-इन-इंडिया, पर्यावरण संरक्षण और अंत्योदय जैसी योजनाएं उन्हीं के एकात्म मानववाद के सिध्दांत पर चल रही हैं। पचास के दशक में जिन सार्वजनिक उपक्रमों का उन्होंने विरोध किया था आज वह सफेद हाथी साबित हो रहे है।
राष्ट्र प्रथम की सोच रखने वाले दीनदयाल उपाध्याय समाज में समता, समानता, सर्वोदय और मानवीय मूल्यों की रक्षा के पक्षधर थे। अगर सीधे और सरल शब्दों में कहा जाए तो उनका एकात्म दर्शन कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के साथ समाज में परस्पर सदभाव, सहअस्तित्व, आर्थिक एवं सामाजिक स्तर पर समानता, शिक्षा एवं स्वास्थ्य की सुगमता, ग्रामों के सशक्तिरण, कृषि विकास, लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रकृति के संरक्षण पर केंद्रीत है। वास्तविक रूप में पंडित जी का एकात्म मानव दर्शन हर राष्ट्र को अपनी प्रकृति के अनुसार विकास करने की स्वतंत्रता देता हैं। वह कहते हैं कि हमारे भौतिक विकास के साथ ही आध्यात्मिक उन्नति भी होती है। एकात्म मानव दर्शन को अगर जाने तो हमें भारतीय संस्कृति के चार पुरूषार्थ के बारे में जानना होगा। यह चार पुरूषार्थ है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। दुनिया के हर मानव जीवन में इन चारों का समान रुप से महत्व है। इन्हीं चारों पुरूषार्थों से युक्त मानव ही दीनदयाल जी के एकात्म मानव दर्शन के केंद्र में हैं।
आज सारी दुनिया उपभोक्तावादी संस्कृति से त्रस्त है। प्रकृति के साधनों का बुरी तरह से दोहन किया जा रहा है। प्रकृति के बढ़ते विनाश के कारण मावन अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है। साठ के दशक में ही दीनदयाल जी ने इस तरफ इशारा किया था उनका सिध्दांत प्रकृति, प्राणियों और प्राकृतिक संसाधनों में ईश्वर के दर्शन की बात करता है। एकात्म दर्शन की सच्चाई यही हैं कि सारी दुनिया आज प्रकृति और उसके संसाधनों को बचाने में जुटी हैं।
पंडित दीन दयाल उपाध्याय के जीवन के अनेक पहलु थे। वह अर्थशास्त्री, राजनीतिक, समाजशास्त्री, इतिहासकार, विचारक, दार्शनिक और महान चिंतक थे। उन्होंने जिस एकात्म मानव दर्शन की बात कही वह भारतीय संस्कृति की खास विशेषता रही हैं। उनका कहना था कि भारत की राष्ट्रीय एकता भारत माता के नारे में समाहित है अगर इससे माता शब्द निकाल दिया जाए तो यह भूमि का एक टुकड़ा बनकर रह जाएगा। धर्म की व्यापकता बताते हुए उन्होंने कहा कि अगर मानव जीवन से धर्म अलग कर दिया जाए तो समाज बिखर जाएगा। उनका कहना था कि पश्चिम जगत में जन्म सिध्दांत समाज और मानव कल्याण के विपरित है। भारत का संपूर्ण कल्याण भारतीय दर्शन में निहित है। निर्धन, अभावग्रस्त और अशिक्षित वर्ग की उन्नति के लिए उन्होंने अंत्योदय की परिकल्पना की थी जो एकात्म दर्शन का ही एक भाग है। उन्होंने निर्धनों को नारायण बताया और कहा कि अगर राजाश्र से ऐसे लोगों को घर-शिक्षा-रोजगार प्राप्त होता है तो राष्ट्र उन्नति के शिखर की तरफ बढ़ने लगेगा। निशुल्क शिक्षा, प्रधानमंत्री आवास योजना और स्ट्रीट वेंडर लोन योजना जैसी योजनाएं आज उन्हीं के स्वप्न के कारण सच हो रही है। उन्होंने दशकों पहले कहा था कि भारत की उन्नति तब संभव है जब वंचितों को उत्थान आरंभ होगा। आज जनधन बैंक खाते और कृषि आधारित स्टार्ट-अप उन्हीं की अर्थनीति को रफ्तार दे रहे हैं। वास्तव में भारत जैसा विविधताओं से भरा राष्ट्र आज एकात्म मानव दर्शन की अवधारणा को समझ रहा हैं। भारत दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थ-व्यवस्था बनने की तरफ अग्रसर है प्रसन्नता की बात यह हैं कि अर्थ-व्यवस्था का लाभ और देश की प्रगति से राष्ट्र संपन्न हो रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)




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