-नरेन्द्र कुमार वर्मा
भारत की आजादी से पहले 3 जून 1947 को माउंटबेटन ने भारत की 562 रियासतों के सामने दो विकल्प रखे थे भारत या पाकिस्तान में विलय। 15 अगस्त 1947 को भारत जब स्वतंत्र हुआ तब भारत की दो मुस्लिम रियासतों के मुखिया जूनागढ़ और हैदराबाद पाकिस्तान की मदद करने में जुटे थे। दोनों ही भारत में विलय के लिए आना-कानी कर रहे थे। भारत के पहले गृहमंत्री जिनकी इच्छा शक्ति से भारत की अधिकांश रियासतों ने भारत में सहर्ष विलय को स्वीकार कर लिया था। उन्होंने हैदराबाद के निजाम को विलय के लिए सोचने के लिए 1 साल वक्त भी दे दिया था। ऐसे में हैदराबाद का निजाम भारत की एकीकरण की प्रक्रिया में हिला-हवाली कर रहा था। हैदाराबाद की 85 फीसदी आबादी हिंदू थी मगर वहां मुस्लिम निजाम का शासन था। वहां प्रशासन और सेना या पुलिस के उच्च पदों पर मुसलमान ही तैनात थे। आजादी के बाद सरदार पटेल ने हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खान को कई पत्र लिखे और भारत में विलय की सलाह दी। मगर उस्मान अली खान विलय न करने पर अड़ा था। जबकि हैदराबाद की सारी जनता भारत के साथ विलय की हामी थी। इसी बीच भारत के खिलाफ युध्द छेडने के लिए आस्ट्रेलिया से सैन्य हथियार मंगाना शुरू कर दिया। वह भारत में विलय के खिलाफ यूएनओ भी गया। सरदार पटेल को जब यह खबर लगी वह युध्द के लिए सैन्य हथियार मंगा रहा है तो भारत ने उसके हवाई मार्ग पर प्रतिबंध लगा दिया।
पाकिस्तान से जिन्ना ने भी चोरी-छिपे बहुत गोला-बारुद हैदराबाद भेज दिया। सरदार पटेल को जब यह बात पता चली कि हैदराबाद में हिंदुओं का कत्लेआम और धर्म परिवर्तन का घिऩौना काम चल रहा है तो उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू से बातचीत की। 12 सितंबर 1948 को दिल्ली में कैबिनेट की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई। इस बैठक में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सहित कई बड़े मंत्री और सेना के वरिष्ठ अफसर मौजूद थे। इस बैठक में सरदार पटेल ने सख्त स्वर में कहा कि निजाम को खदेड़ कर अगर हिंदुओं को नहीं बचाया गया तो यह देश हमें कभी माफ नहीं करेगा। 13 सितंबर 1948 को सरदार पटेल के नेतृत्व में भारतीय सेना ने हैदराबाद में ऑपरेशन पोलो शुरू किया। महज 5 दिनों में भारतीय सेना की 109 घंटे चली कार्रवाई में निजाम की सेना गीदड़ की तरह भाग खड़ी हुई। भारतीय सेना ने हैदराबाद के चप्पे-चप्पे पर कब्जा कर लिया और 17 सितंबर 1948 को हैदराबाद के भारत में विलय की घोषणा कर दी गई। ए.जी नूरानी अपनी किताब “द डिसट्रेक्शन ऑफ हैदराबाद” में लिखते हैं ‘कैबिनेट की बैठक में सरकार पटेल ने सैनिक कार्रवाई को पहला विकल्प बताया उन्होंने कहा उनका धैर्य निजाम की हरकतों से जवाब दे रहा है, वह निजाम की नीतियों के सख्त खिलाफ हैं। फिर भी नेहरू सैनिक कार्रवाई के पक्ष में नही थे। “वीपी मेनन ने एचवी हॉडसन” को दिए अपने इंटरव्यू में कहा ‘नेहरू बैठक से उठ कर चले गए थे। मैं भी उनके पीछे-पीछे बाहर आ गया था। सरदार पटेल भी गुस्से में उठकर चले गए थे। इसके बाद राजाजी ने मेनन से संपर्क किया और दोनों सरदार पटेल के घर पहुंचे। सरदार पटेल बिस्तर पर लेटे हुए थे और उनका ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ा हुआ था वह हमसे मिलने के बाद गुस्से से चिल्लाए आखिर नेहरू अपने आप को समझते क्या है, आजादी की लड़ाई क्या उन्होंने ही लड़ी, दूसरे लोगों ने भी लड़ी।’

दरअसल आजादी के बाद हैदराबाद भारत के शरीर में एक कैंसर की तरह पनप रहा था। सरदार पटेल जानते थे कि अगर सर्जिकल ऑपरेशन नहीं किया गया तो परिणाम ठीक नहीं होगा। इंदर मल्होत्रा अपनी किताब “द कॉरसेज दैट लेड ऑपरेशन पोलो” में लिखते हैं। ‘मगर तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल रॉबर्ट बूचर इसके खिलाफ थे उन्होंने नेहरू से कहा कि अभी भारत का कश्मीर के साथ विवाद सुलझ नहीं पाया अगर हैदराबाद में सेना भेज दी गई तो हमें दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ेगी जिसके लिए हम अभी तैयार नहीं है। रॉबर्ट बूचर ने यहां तक कह दिया कि अगर मेरी बात नहीं मानी गई तो मैं कल ही अपना इस्तीफा दे दूंगा। बूचर की यह बात सुनकर मीटिंग में सन्नाटा छा गया। मगर सरदार पटेल तो तय करके ही आए थे कि उन्हें क्या करना है। उन्होंने बूचर की तरफ देखते हुए कहा कि अगर आप इस्तीफा देना चाहते हैं तो कल क्यों, आज ही दे दीजिए क्योंकि कल मैं हैदराबाद पर सैनिक कार्रवाई शुरू करूंगा।’
सरदार पटेल जानते थे कि हैदराबाद रणनीतिक और सामरिक दृष्टिकोण से भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। उसके उत्तर में मध्य प्रांत, दक्षिण में मद्रास और पश्चिम में मुंबई स्थित हैं। वहां शासन करने वाला निजाम कट्टरपंथी विचारधारा वाला था। जिसका सबसे बड़ा उदारहण वहां कि विधानसभा के 132 सदस्यों में नाममात्र के भी हिंदू नहीं थे। भारत की आजादी के फौरन बाद निजाम ने अपने आप को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया था। सरकार पटेल को खुफिया अधिकारी लगातार निजाम की एक-एक हरकत की जानकारी दे रहे थे वह भारत में विलय के मामले को उलझाए रखना चाहता था। इसी बीच निजाम के संगठन मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एमआईएम) ने हैदराबाद में हिंदुओं का कत्लेआम शुरू कर दिया था। और हैदराबाद में हिंदुओं को मुसलमान बनाने का अभियान चलाया जा रहा था। उसने मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के 20 हजार सदस्यों जिन्हें रजाकार कहा जाता था उन्हें हिंदूओ के कत्लेआम करने और आतंक फैलाने के लिए हैदराबाद में जगह-जगह फैला दिया था। एक साल के भीतर ही हैदराबाद के हिंदूओं का जीवन नरक बन गया था। पटेल इस तरह की खबरों से बहुत दुखी थे लिहाजा वह हर हाल में निजाम को सबक सिखाना चाहते थे।
भारत में विलय के बाद हैदराबाद, वारंगल और बिदार क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हजारों सत्याग्रहियों ने प्रभात फेरियां निकाली और विजयी विश्व तिरंगा प्यारा गीत गाकर सड़कों को गुलजार कर दिया। भारत में विलय के बाद निजाम की सेना ने हथियार डाल दिए और निजाम अपने सलाहकारों के साथ भाग खड़ा हुआ। भारत की संप्रभुता के विरुध्द साजिश रचने वाला हैदराबाद का निजाम बेआबरू हो कर वहां से बाहर निकला।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार




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