सरकारी शराब और उसका खेल अगले अंक
रायपुर// छत्तीसगढ़ की दोनों सरकारें चुनाव में जनता से वादा जरूर करती
हैं कि हम शराबबंदी कानून लेकर आएंगे और छत्तीसगढ़ में पूर्ण शराबबंदी कर देंगे इस
जुमले से उन पीड़ित महिलाओं को बहुत हमदर्दी की
राहत मिलती है और वह इसी आशा से की सरकार शराबबंदी कर देगी जिससे
उनकी आने वाली पीढ़ी का इस सामाजिक बुराई से निजात मिल जाएगा । शराब को लेकर सबसे ज्यादा यदि
परेशान हैं तो वह ग्रहणीया है.
माताएं हैं, पत्नियां हैं, जो शराब की लत मैं डूबे अपने पति अपने बेटे अपने
भाई की हालत नशे में देख कर चिंतित दुखी
और परेशान दिखाई देती हैं पर हर
चुनाव में इन महिलाओं को राजनीतिक पार्टियों द्वारा धोखा
दिया जाता है. चुनाव जीतने के बाद राजनीतिक
पार्टियां तरह-तरह के कुतर्कों का सहारा लेकर यह बयान देती रहती हैं की एकदम से शराबबंदी होने से नशेड़ी दूसरे नशे
की तरफ चले जाएंगे जो इससे ज्यादा घातक है अतः हम यह हमारी सरकार चरणबद्ध तरीके से
शराबबंदी करेंगे एक बात समझ से परे है कि जब कोई कानून बन जाता है तो उसका सख्ती
से पालन कराने की जिम्मेदारी सरकार की रहती है कानून तो सरकार बना देती है पालन
करने की जिम्मेदारी स्थानीय एडमिनिस्ट्रेशन पर होती है उसमें सबसे महत्वपूर्ण
भूमिका पुलिस की होती है कलेक्टर की होती है एसपी की होती है पर यह विडंबना है की
शराब को लेकर ना तो कोई कलेक्टर एसपी थानेदार कभी भी सीरियस दिखाई नहीं देते उसका
कारण है शराब का प्रचलन करीब-करीब हर घर में है आज किसी ना किसी घर का कोई ना कोई
सदस्य शराब का स्वाद चख रहा है इसका मतलब है की शराब का धंधा कितने बड़े रूप में
फैल चुका है जब यह धंधा इतने बड़े रूप में फैला हुआ है तो इस धंधे से होने वाली
कमाई का भी हिसाब किताब दूसरे धंधों से कहीं अधिक है सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि
यह धंधा टोटल केस में होता है शराब खरीदी
का मामला हो चाहे शराब पिलाने का मामला हो या
कोचिंग द्वारा घर पहुंच सेवा हो
पूरा धंधा नगदी इस परही होता है ना तो जीएसटी का कोई लेना देना है ना ही इनकम
टैक्स को ना ही सेल टैक्स को इस धंधे को से लेना देना है लेना देना सिर्फ पुलिस को है. जिसकी नैतिक जिम्मेदारी है
कि उसके इलाके में किसी भी तरीके का नशा या नशेड़ी
या कोच्चिया , शराब विक्रेता दिखाई तक ना दे जब
तक पुलिस इस मामले में शक्ति नहीं दिखाएगी तब तक यह नशा हमारे जवानी के रगों में यूं ही
दौड़ता रहेगा|
मामला सरकारों की जुमलेबाजी का है
वर्तमान सरकार ने अपने मेनिफेस्टो में बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था की हमारी
सरकार आई तो हम पूर्ण शराबबंदी की ओर आगे बढ़ेंगे सरकार बन गई सरकार ने सत्ता
संभालने के बाद यह कहा कि हम शराब बंदी के प्रति वचनबद्ध हैं लेकिन इसका अध्ययन कर
हम फैसला लेंगे अब उन्होंने यह तो नहीं कहा कि शराबबंदी नहीं करेंगे लेकिन इस पैच को डालकर उन्होंने अगले कई वर्षों तक
शराबबंदी को लेकर जो जुमला उन्होंने चुनाव में दिया था को लेकर मुक्ति पा ली है
पहले की सरकारों ने भी काफी अध्ययन किया उन प्रदेशों में भी गए जहां पूर्ण शराबबंदी है लेकिन कोई ठोस पहल नहीं निकली और लगातार
शराब की बिक्री में बढ़ोतरी होती रही इस सरकार ने भी सत्यनारायण शर्मा जो पहले भी
आबकारी मंत्री हुआ करते थे की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर दिया है
समिति का गठन कर सरकार ने तो शराबबंदी से पल्ला झाड़ लिया है समिति
इतनी धीमी गति से चल रही है की उसको अध्ययन कर फाइनल रिपोर्ट प्रस्तुत करने में कम
से कम 4 वर्ष लगेंगे अगला चुनाव आ जाएगा फिर महिलाओं द्वारा जिनकी सत्ता में 50% तक भागीदारी है इस मुद्दे को फिर
उठाएंगे और उन्हें फिर आश्वासन दिया जाएगा किस समिति की रिपोर्ट आ गई है अगली बार
हमारी सरकार आएगी तो हम शराब बंदी समिति की अनुशंसा के आधार पर कर देंगे पर ऐसा
होता नहीं सरकारी यूं ही चलती रहती हैं शराब बिकती रहती है शराब बिक्री के पीछे जो
लॉबी है वह इतनी तगड़ी है की सरकार को इस नशे से बाहर निकल नहीं देती सबसे ज्यादा पैसा अगर नेताओं को अफसरों
को थानेदारों को आबकारी विभाग के अफसरों को
बिना किसी हीला हवाला के अगर पहुंचता है तो वह शराब माफिया के द्वारा ही पहुंचता
है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह
पैसा अरबों रुपए में होता है ,और नगद होता है टोटल काला धन शराब
के कारोबार में लगा हुआ है इसी वजह से ना तो नेता ना सरकार ना कोई अधिकारी इस धंधे
को इस धंधे से जुड़े लोगों को निम्मी दृष्टि से
भी नहीं देखती छत्तीसगढ़ में इस धंधे के शिरोमणि पप्पू भाटिया. अमोलक सिंह भाटिया.
सुरजीत सिंह भाटिया पिछले 25 वर्षों से यह धंधा बड़े ही सिस्टमैटिक
ढंग से करते आ रहे हैं इनकी कमाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की जितना
पैसा यह ठेकेदार सरकारी खजाने में
जमा करते हैं उतना ही पैसा यह सरकार के उन लोगों को भी बांटते हैं जो इनके धंधे के
आसपास रहते हैं मसलन पुलिस एडमिनिस्ट्रेशन नेता छोटे नेता पत्रकार वगैरह ।
शराब के धंधे का टर्नओवर सरकारी गैर सरकारी और मुनाफे को
मिलाकर करीब 15000 करोड़ का है इस धंधे से सरकार के खजाने में तो 35 सौ से 4000 करोड़ ही आते हैं बाकी यह 11000
हजार 12 हजार करोड़ रूपया काले धन के रूप
में बाजार में घूमता रहता है इस पर किसी तरीके की कोई चेकिंग
नहीं है शराब माफिया इस पैसे को जमीनों में लगाकर अनाप-शनाप तरीके से टैक्सेशन को
बचाव कर लेते ।




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