अब कमलनाथ की बारी
सत्ता संघर्ष इसके पहले की प्रजातांत्रिक
संविधान को निगल जाए देश के तमाम विपक्षी दल की सरकारों
को राज सत्ता की चाबी गृह मंत्री अमित शाह को सौंप देनी चाहिए। कर्नाटक में चल रहे संवैधानिक संकट के
पीछे जहां एक और बिकाऊ दल बदलू विधायक हैं जो जनता के जनमत को पैसे से सत्ता पाने की लालच में बेचने तैयार है
नैतिकता का तो कहीं दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है अनैतिक तरीके से सत्ता की चाबी
हासिल करने के लिए वह तमाम विधायक हॉर्स ट्रेडिंग के लिस्ट में है जो कर्नाटक में
चल रही सरकार के खिलाफ जाकर भा जा पा में अपनी हिस्सेदारी खोज रहे ।
वैसे
तो जिस दिन कर्नाटक विधानसभा के परिणाम घोषित हुए
थे , उस वक्त भाजपा सबसे बड़ी
पार्टी थी लेकिन सत्ता सुख के भोगी देव गोड़ा ने अपने बेटे को सीएम बनाने के चक्कर
में कांग्रेस से हाथ मिलाया लिया जबकि
संख्या बल के आधार पर कुमार
स्वामी किसी भी तरीके से मुख्यमंत्री नहीं बन सकते थे. लेकिन कांग्रेस ने अपनी ओछी नीति के चलते सबसे बड़े दल भा जा पा
को एक दिन सत्ता में रहने दिया और पीछे के दरवाजे से कुमार स्वामी को सपोर्ट कर
मुख्यमंत्री बना दिया यह भी नहीं होना चाहिए था. लेकिन हुआ कुमार स्वामी कुर्सी पर
तो बैठ गए लेकिन कांग्रेस के विधायकों ने मलाईदार मंत्रालय लेकर कुमार स्वामी की कुर्सी
में रोज
कील ठोकना शुरू कर दिया कुमार
स्वामी कुर्सी पर तो बैठे थे लेकिन कंफर्टेबल नहीं थे वह कांग्रेस के मंत्री और
विधायकों के अनैतिक दबाव से परेशान होकर कई बार सदन और सदन के बाहर रोते हुए दिखाई
दिए ।
इधर लोकसभा में भाजपा की सरकार को प्रचंड बहुमत मिल गया था उसी
वक्त से यह कयास लगाए जा रहे थे कि सबसे पहले
कर्नाटक फिर मध्य प्रदेश उसके बाद राजस्थान
सरकारों का सिंहासन हिलेगा कयास ठीक निकला
अभी मोदी सरकार को सत्ता चलाते हुए कुछ ही दिन हुए
थे की कुछ ही यह खबर आ गई की कांग्रेस के 10 और जेडीएस के तीन विधायकों ने अपना
इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया है यह भी एक तरह का नाटक था इस्तीफा तकनीकी तौर पर पहले विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा जाना
चाहिए था लेकिन नाटक का प्रारूप कुछ इस तरह से लिखा गया था की जब प्रेशर से
सौदेबाजी का एपिसोड समाप्त हो जाए उसके बाद विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफे दिए जाएंगे चतुर विधानसभा अध्यक्ष ने अपने
अधिकारों का प्रयोग करते हुए इस्तीफे को ले तो लिया लेकिन स्वीकृत नहीं किए यह भी
एक संवैधानिक दांव पैच था . अब जब इस्तीफे स्वीकृत नहीं हुए तो विधायक सुप्रीम कोर्ट की
ओर चले गए सुप्रीम कोर्ट ने भी जल्दबाजी में अजीबोगरीब निर्णय दे दिया और विधानसभा
अध्यक्ष को आदेश कर दिया कि शाम तक विधायकों के इस्तीफे के बारे में निर्णय जो दो संविधान पदों के टकराव का
मामला बनता गया .
विधानसभा अध्यक्ष को सुप्रीम कोर्ट किसी भी तरीके के या इस तरह के आदेश नहीं दे
सकता वह संविधान की परिभाषित
सीमाओं का उल्लंघन था.
विधानसभा अध्यक्ष ने दो टूक कहा कि सुप्रीम कोर्ट कौन होता है हमें आदेश देने वाला
अब मामला दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच में फस गया है
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश
पर फजीहत होते देख मामले को मंगलवार तक के लिए संवैधानिक बेंच को सौंप दिया।
प्रजातंत्र के संविधान की इस तरीके से छीछालेदर तो हो ही रही थी. कि अचानक गोवा में चल रही बीजेपी
की कमजोर सरकार को कांग्रेस के 10 विधायकों ने अलग दल बनाकर भाजपा की
सदस्यता ग्रहण कर ली और कमजोर सरकार को
मजबूत बना दिया ताजा हालात हैं कि दल बदल
कर आए उन तमाम विधायकों को कुछ ना कुछ मलाईदार पद मिलना शुरू हो गए हैं हाल ही में
3 मंत्री भी बनाए जा चुके हैं राजनीतिक
विशेषज्ञ तो यह नहीं कहते कि यह परिवर्तन की बयार है लेकिन बयार चल पड़ी है
दूसरा नंबर मध्य प्रदेश सरकार का है जहां पर परिवर्तन की बयार के झोंके आना शुरू
हो गए लेकिन उससे पहले अचानक पश्चिम बंगाल का जिक्र भी सुर्खियों में है कि वहां
टीएमसी के करीब 20 विधायक
भाजपा के संपर्क में हैं जो कभी भी सत्ता का सुख प्राप्त करने के लिए टीएमसी को
छोड़ सकते हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में अभी हाल ही में चुनाव होने हैं इसलिए दल बदलू
विधायकों को भाजपा में है किया जा सकता है लेकिन सत्ता का सुख चुनाव के बाद ही मिलेगा।
इस वक्त सत्ता परिवर्तन की कमजोर सरकार कमलनाथ की सरकार है
जिसमें कुछ ही विधायक इधर से उधर हुए और सत्ता गिर जाएगी लेकिन कमलनाथ के सूत्रों
का कहना है कि उन्होंने मोदी जी से अपना गठजोड़ कर लिया है और आश्वासन दिया है कि
पश्चिम बंगाल में वह पीछे के दरवाजे से बीजेपी को पूर्ण मदद करेंगे अतः मध्य
प्रदेश में हमारी सरकार को स्थिर रखें लेकिन सत्ता पाने के उतावले बीजेपी के छोटे
बड़े नेता बयान दे रहे हैं सोशल मीडिया पर सरकार गिरने की खबरें वायरल हो रहे हैं
सत्ता हाथ से चली जाए का डर तो होता ही है अतः कमलनाथ जी अपने सहयोगी दलों के लिए
दिल खोलकर मलाईदार लालच देकर उनसे बयान बाजी करवा रहे हैं की कमलनाथ की सरकार
गिरने नहीं देंगे लेकिन कमलनाथ की सरकार कोई बाहर का दल नहीं कराएगा ज्योतिराज
सिंधिया के साथ जो भितरघात हुआ है उससे करीब 40 विधायक कभी भी कमलनाथ का साथ छोड़ सकते
हैं।




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