10,000 किसान उत्पादक संगठन बनाने की घोषणा, पहले के किसान उत्पादक संगठन बदहाल पड़े हैं।
कल भारत सरकार की ओर से वित्त मंत्री ने
देश का बजट 2019 पेश किया। एक नई परंपरा की शुरुआत करते हुए हमारे देश के श्रेष्ठि
जनों की ( सेठ साहूकारों की) परंपरगत
महाजनी पद्धति को अपनाते हुए लाल मखमली कपड़े में लिपटे हुए बही खाते के रूप में
देश का बजट संसद में पेश किया। बजट दरअसल 'बुजेट' अथवा 'बुझेट' ( फ्रेंच शब्द) 'चमड़े का वह प्रसिद्ध थैला' था जिसमें भरकर सन 1733 में तत्कालीन ब्रिटिश वित्त मंत्री रॉबर्ट
वालपोन ने ब्रिटिश संसद में देश के वार्षिक आय-व्यय का लेखा-जोखा वाले कागजात लेकर
आए थे, ,और संसद के उत्सुक सांसद चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे, वह
'बुजेट'
(चमड़े
का थैला खोलो), बुजेट खोलो, और आय-व्यय का लेखा-जोखा संसद को
बताओ...।
देश के किसानों को जबरदस्त उम्मीदें थी कि
इस लाल मखमली कपड़े में लिपटे महाजनी बही
खातों में से सबसे ज्यादा सौगातें तथा मदद
उनके लिए ही निकलने वाली हैं। पर अफसोस इस बजट में किसानों के लिए "जीरो
बजट" की जो अवधारणा निकली उसने इस बजट को फिर से अ-बुझेट , अर्थात अबूझ पहेली बना दिया। अब किसान यह सोचने को मजबूर हो गए हैं
कि, महाजनी खातों से किसानों का कभी भला नहीं हुआ, सदियों से किसानों का उत्पादन की आय
उनके परिवारों के बचे-खुचे गहनें उनकी जमीनें, सब इन महाजनी खातों के अंतहीन पेट में समाती रही हैं, और अब आगे भी यही होगा, करता
यही किसान की नियति है?
दरअसल *"जीरो बजट" खेती इस
भ्रामक नाम ने सरकार को एक बढ़िया मौका दे
दिया, किसानों को निरुत्तर करने का। अरे भाई
किसान जी,,,जब आप की खेती की लागत ही जीरो है ,,,जब आप की समूची खेती ही "जीरो
बजट" की है ,तो फिर, जो कुछ भी उत्पादन का मूल्य आपको मिल
रहा है,वह
सब का सब फायदा ही फायदा तो है, चाहे फिर इसे आप डेढ़ गुना मान लें ,,चाहे दोगुना ,,,चाहे 100 गुना,, क्योंकि फसल की लागत तो भाई साहब,,आपकी जीरो है,,,,। हमारे महाराष्ट्र के एक युवा किसान साथी हैं , उनके यहां भी इस जीरो बजट खेती का बड़ा
प्रकोप हुआ था। उन्होंने जीरो बजट खेती की एक नई परिभाषा दी बताया कि खेती में अगर
खर्चा ₹100 हो और कुल आमदनी भी ₹100 ही हो तो इसे जीरो
बजट खेती कहेंगे ,
क्योकि
किसान के हाथ में भी जीरो ही आएगा। वाह क्या शानदार योजना है।
सचमुच
गजब गफलत
है, इस अर्थ प्रधान युग में, पूरी दुनिया में, बिना पैसे के कुछ भी नहीं होता है, जहां हर सरकारी परियोजना ( चाहे योजनाएं राज्य क्यों हो अथवा केंद्र की) का बजट
हर साल 10% से 20% की दर से बढ़ता जा रहा
है,, कर्मचारियों की तनख्वाह ही बढ़ती जा
रही है, बाजार में महंगाई बढ़ती जा रही है, साथ ही साथ महंगाई भत्ता भी बढ़ते जा
रहा है,, वहां यह सरकार, खेती और किसानों के लिए, अब "जीरो बजट" ढूंढ रही
है.ढूंढ चुकी है।
जीरो बजट सी झूठी अवधारणा पर भी अपनी पैनी
उर्वरा कलम तथा अपनी मारक जुबान भरपूर
चलाने की कृपा करें, सरकार से भी निवेदन है कि वह
"जीरो बजट" जैसी अव्यवहारिक, कोरी अवधारणाओं में ना उलझे तथा ठोस
दीर्घकालिक नीतियां और भरपूर बजट ( न कि "जीरो बजट" ) लेकर खेती तथा
किसानी में आमूलचूल परिवर्तन करने के लिए आगे आएं,इस कार्य में देश के किसान अपनी
जिम्मेदारी भली-भांति समझते हैं, सरकार के साथ कंधे से कंधा
मिलाते हुए पूरी मजबूती के साथ खड़े हैं।
इसके
अलावा 10000 और किसान उत्पादक संगठन बनाने की बात कही गई है, यहां लाख टके का सवाल यह है कि, विगत वर्षों में जो किसान उत्पादक
संगठन बने थे, उनमें से अधिकांश बदहाल पड़े हैं,फिर इन नये दस हजार और संगठनों के लिए
क्या ठोस योजना है?
प्रधानमंत्री
फसल बीमा योजना की खामियों को कैसे दूर किया जाएगा, यह भी देखने वाली बात है।इन हालातों
में 2022 तक किसानों की आय कैसे दुगुनी होगी , यह यक्ष प्रश्न है।
सरकारों, नीति निर्माताओं, तथा मीडिया को,देश की खेती तथा किसानों के लिए
वर्तमान बेहद कठिन दौर में यह कार्य अनिवार्य रूप से करना इस समय सर्वथा उचित होगा,,शायद इससे खेती तथा किसानों के प्रति
अब तक किए गए भीषण अन्यायों तथा सभी स्तर पर किए गए शोषण का कम से कम कुछ तो प्रायश्चित हो सके।
डॉ
राजाराम त्रिपाठी,
राष्ट्रीय
समन्वयक अखिल भारतीय किसान महासंघ आइफा
कोंडागांव
बस्तर छत्तीसगढ़




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