दिव्य-दूत

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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थों धनुर्धरः तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥

Anil Choubey 05-10-2022 16:52:08


दिव्य दूत परिवार की ओर से विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं आशा ही नहीं विश्वास है आप अपने भीतर बेठे रावण पर  विजय श्री प्राप्त करेंगे

मम क्षेमारोग्यादिसिद्ध्‌यर्थं यात्रायां विजयसिद्ध्‌यर्थं। गणपतिमातृकामार्गदेवतापराजिताशमीपूजनानि करिष्ये॥

रायपुर // 05/10/2022/// असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर अच्छाई की विजय ,के लिए पूरे विश्व में मशहूर है विजयदशमी के दशहरे का  पर्व  सनातन धर्म के  धर्मालंबी   पूरे विश्व में  गृहवास करते आ रहे हैं, इस  लिए भी यह त्यौहार पूरी दुनिया में  धूमधाम से मनाया जाता है , बुराई के प्रतीक पुतले के रूप में कहीं रावण को   दहन  किया जाता है  तो कहीं उसकी पूजा भी होती है  रावण विद्वान था शक्तिमान था  फिर भी इसमें इतनी बुराइयां भरी हुई थी कि वह बुराई के रूप में ही प्रतीकात्मक चिन्हित  हुआ वेसे  दक्षिण भारत में रावण की पूजा होती है उत्तर भारत में बुराई के प्रतीक स्वरूप उसके पुतले का दहन होता है  कुल मिलाकर मामला सिर्फ यही है की आने वाले नए वर्ष  में अपने भीतर जो रावण रूपी राक्षस बैठा रखा है जिसके कारण सामाजिक समरसत्ता  खराब हो रही  हैं को  पूर्णता  नष्ट करें और  सामाजिक समरसतता  का  संतुलन करते हुए मानव रूपी जीवन में सच्चाई के रास्ते पर आगे चल सकें |

दशहरा (विजयादशमी व आयुध-पूजा) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाता है (दशहरा = दशहोरा = दसवीं तिथि)। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा।

 

इस दिन लोग शस्त्र-पूजा करते हैं और नया कार्य प्रारम्भ करते हैं (जैसे अक्षर लेखन का आरम्भ, नया उद्योग आरम्भ, बीज बोना आदि)। ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो कार्य आरम्भ किया जाता है उसमें विजय मिलती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन स्थान-स्थान पर मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण मेघनाद कुभंकरण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।

दक्षिण का दशहरा

महत्तत्व

लंकापति दशानन रावण

दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है। समस्त भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर 'सिलंगण' के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है। सायंकाल के समय पर सभी ग्रामवासी सुंदर-सुंदर नव वस्त्रों से सुसज्जित होकर गाँव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्तों के रूप में 'स्वर्ण' लूटकर अपने ग्राम में वापस आते हैं। फिर उस स्वर्ण का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है।

 

 

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