रायपुर // प्रति वर्ष कुत्ता बंदर और रेविज बैक्टीरिया को कैरी
करने वाले जानवरों से हजारों की संख्या
में बच्चों को महिलाओं को और बुजुर्गों को काटकर निशाना बनाया जाता है बरसात शुरू
होने से पहले एक अजीब टाइप का माहौल कुत्तों में देखने के लिए मिलता है वह बोराए
बोराए से घूमते हैं , और सबसे पहले बच्चों
को फिर महिलाओं को अपना निशाना बनाते हैं नगर निगम नगर. नगर पालिका और ग्राम पंचायत इन आवारा कुत्ता और
पशुओं की रोकथाम के लिए कहीं नसबंदी करके
उन्हें जंगल में छोड़ा जाता है
लेकिन वह फिर शहर ,गांव ,कस्बों में आ जाते हैं और मानव जाति को अपना निशाना बनाते हैं रेवीश
बैक्टीरिया बहुत ही खतरनाक किस्म का बैक्टीरिया होता है एक बार यह मनुष्य के शरीर
में किसी तरीके से प्रवेश कर जाए तो उसका बचना तभी संभव है जब एंटी रेबीज वैक्सीन
का उसे तुरंत इंजेक्शन दिया जाए|
एंटी रेबीज वैक्सीन की हर वर्ष
छत्तीसगढ़ में अनुमानित डेढ़ लाख वैक्सीन की जरूरत पड़ती है पर सरकार के पास सिर्फ
और सिर्फ कुछ हजारों में ही यह उपलब्ध है
दूरदराज गांवों में तो यह मिलता ही नहीं जिलों में भी इसकी भारी कमी रहती है, एंटी
रेबीज वैक्सीन सरकार द्वारा खरीद कर जिला अस्पतालों में प्रदाय क्या जाती है आंकड़े बताते हैं की रेवीश की रोकथाम के
लिए जो भी एंटीबायोटिक वैक्सीन उपलब्ध हैं
वह ना के बराबर हें निजी अस्पतालों में
मेडिकल दुकानों में इस वक्त एंटीबायोटिक इंजेक्शन और एंटी रेबीज इंजेक्शन नदारद हें
किसी भी दुकान में इसे लेने जाओ नॉस्टॉक
का साइन बोर्ड लगा रखा है यह क्यों हो रहा है जबकि जीवन रक्षक दवाओं में यह दोनों
वैक्सीन सूचीबद्ध है फिर भी इन की भारी कमी है सूत्रों के अनुसार दोनों वैक्सीन
भारत में भी बनते हैं पर इनका एक्सपोर्ट
होने के कारण कंपनियां भारत में सप्लाई
नहीं कर रही है एक्सपोर्ट में कंपनियों को इस वैक्सीन की अच्छी खासी कीमत मिलती है
इस वैक्सीन को बनाने के लिए जो रा मटेरियल लगता है उसमें से अधिकतर मटेरियल चीन के
द्वारा सप्लाई किया जाता है चीनी मेडिसन कंपनियां उस मैटेरियल को भारतीय कंपनियों
को प्रदाय कराती थीं लेकिन पिछले साल से
आर्थिक संबंधों में जो खटास आई है उसके चलते भारत सरकार ने उस मटेरियल की सप्लाई
पर रोक लगा दी है इसके कारण भी वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां दिक्कत में है जैसे
तैसे वह इस रॉ मैटेरियल को दूसरे देशों से प्राप्त कर रही हैं तो उसकी कीमत काफी अधिक होने के कारण वैक्सीन को
भारतीय बाजार में नहीं बेचा जा रहा है अब यह छोटी सी गलती या यूं कहें की प्रतिबंध
लगाने से पहले केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए था या वैकल्पिक व्यवस्था करनी
चाहिए थी इस रा मटेरियल के लिए क्या इंतजाम हें लेकिन ऐसा नहीं हुआ जिसके कारण पिछले 2 सालों से पूरे भारत में इन जीवन रक्षक दवाई की भारी कमी महसूस की जा रही है
एंटी
रेबीज वैक्सीन या आलर्क निरोधी वैक्सीन उस स्थिति में दिया जाता है जब किसी व्यक्ति को पागल कुत्ता, गीदड़, भेड़िए आदि काट ले| मरीज को ७२ घंटे के अंदर आलर्क निरोधी
वैक्सीन लगवाना आवश्यक है| वैक्सीन
न लगवाने की इस्थिति में रेबीज़ रोग होने का खतरा होता है|इस टीके की खोज लुई पास्चर नामक
फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने की।
एंटी
रेबीज टीका
(वैक्सीन), रेबीज की
बीमारी से बचने में कारगर है| इसका
वैक्सीन कई प्रकार में उपलब्ध है और कारगर के साथ-साथ सुरक्षित भी है| यह वैक्सीन, कुत्ते द्वारा काटने के बाद रेबीज के
विषाणु के संपर्क में आने पर, रेबीज
बीमारी से कुछ समयांतराल तक बचाने के लिए उपयुक्त है| इस वक्सीनेशन के तीन डोज़ के बाद से
ही जो प्रतरोधक छमता शरीर में तैयार होती है वह काफी समय तक बानी रहती है| एंटी रेबीज वैक्सीन को इंजेक्शन के
द्वारा मासपेशियों () में दिया जाता है| एंटी रेबीज का वैक्सीन, रेबीज इम्मुनोग्लोबुलिं (rabies immunoglobulin) के साथ-साथ दिया जाता है| जो लोग ऐसे छेत्रों में रहते हैं या
फिर ऐसे पेशे मैं हैं जहाँ पर रेबीज के विषाणु से संपर्क का काफी खतरा हो, उन्हें भी एंटी रेबीज वैक्सीन डॉक्टर
की सकह पर, लगातार
अंतराल पे लगवाना चाहिए|
रोग रेबीज के वीथिका विषाणु (street virus) से होता है किंतु इसी विषाणु का
निस्तेजित रूपवाला स्थिर विषाणु (fixed virus) रोगकारी नहीं है किंतु रोगनिरोधी प्रतिरक्षी का उत्पादक है। रेबीज
के स्थिर विषाणु को भेड़ या खरगोश के मस्तिष्क में उत्पन्न करते हैं और फिर
मस्तिष्क को पीसकर फ़िनोलयुक्त लवण विलयन में विलयन बना लेते हैं। पागल कुत्ते के
काटने पर आवश्यकतानुसार 14 दिन तक
नित्य एक टीका लगाते हैं। इस वैक्सीन की शक्ति बढ़ाकर कुत्तों को टीका लगाकर उन्हें भी आलर्क रोग
से बचाया जा सकता है।




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