वन-पुरुष
यह कोई अफ़साना नहीं, एक हक़ीकत है। उस इंसान के जीवट की, जिसके जुनून ने एक रेतीले दरिया को हरियाली के समंदर में तब्दील कर दिया। किसी संस्था या मशीनरी की मदद के बिनाअकेले दम पर उसने लगभग 1400 एकड़ का एक जंगल ही बसा डाला। और जंगल में हरीतिमा भी ऐसी कि आज वहां वन्य प्राणियों का एक भरा-पूरा संसार है। बाघ, हाथी, हिरन, गैंडे से लेकररंग-बिरंगे परिंदों तक। फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया के रूप में प्रसिद्ध हो चुके जादव पायेंग का यह सफर आज भी बदस्तूर जारी है। वन्य प्राणियों और वनस्पतियों के प्रति इस वन-पुरुष के असीमप्यार की एक बेमिसाल कहानी।
रईस अहमद 'लाली'
50 के दशक में फ्रेंच लेखक ज्यां गिओनो ने अपनी कहानी 'द मैन हू प्लांटेड ट्रीज' के जरिए एल्जियर बूफिये नामक एक ऐसे किरदार से दुनिया का परिचय कराया था, जिसे पेड़ों से बेइंतहा मोहब्बत थी। पेड़ ही उसकीज़िंदगी थे। पेड़ों के प्रति उसकी दीवानगी की कहानी इतनी जीवंत और कारुणिक थी कि लोगों ने एल्जियर बूफिये को एक सच्चा किरदार ही मान लिया था। उससे मिलने की इच्छा जताने लगे थे लोग। उस किरदार की तलाश मेंवे लेखक ज्यां गिओनो तक भी पहुंचने लगे थे। तब जाकर लेखक ने इस बात का खुलासा किया कि दरअसल एल्जियर बूफिये कोई ज़िंदा किरदार नहीं, बल्कि कहानी के लिए गढ़ा हुआ एक काल्पनिक किरदार है। लेकिन यहांहमारी कहानी का नायक जादव पायेंग एक जीता-जागता किरदार है। और उसकी कहानी सौ फीसदी सच। एल्जियर बूफिये की तरह उसे भी पेड़ों से प्यार है। अगाध प्रेम, जिसे आप जुनून का नाम भी दे सकते हैं। और जुनून ऐसाकि उसने अकेले बूते लगभग 1400 एकड़ का जंगल बसा दिया है। वह भी एक ऐसे इलाके में, जो रेत का दरिया था। जहां रेत की नदी बहती थी। पूर्वोत्तर असम में जोरहाट ज़िले के रेतीले माजुली द्वीप स्थित यह जंगल आज ढेरोंवन्य प्राणियों का बसेरा है। साथ ही सैकड़ों किस्म की वनस्पतियों का खज़ाना भी। किसी एक आदमी द्वारा बनाया-बसाया यह दुनिया का सबसे बड़ा जंगल भी है। 'मोलाई कोठानी' जंगल। मोलाई कोठानी यानी मोलाई कीलकड़ी। मोलाई उपनाम है जादव पायेंग का और उनके सम्मान में स्थानीय लोग इस जंगल को 'मोलाई कोठानी' कहते हैं। यह अलग बात है कि दुनिया के लिए यह 'मिशिंग फॉरेस्ट' है और पायेंग 'फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया'।लेकिन हमारे लिए जादव पायेंग 'वन-पुरुष' हैं।
बात 1979 की है। तब ब्रह्मपुत्र उस रेतीले इलाके में एक और बाढ़ का बायस बनी। इस बाढ़ ने वहां की हर चीज़ को तहस-नहस कर दिया। जादव पायेंग तब महज 16 साल के थे। इससे पहले बाढ़ के कारण ही उनकापरिवार माजुली छोड़ गया था। पायेंग ने बालीगांव में रहते हुए तब तक 10वीं का इम्तहान दे दिया था। माजुली द्वीप पर जब बाढ़ का पानी सूखा तो पायेंग अपने मवेशियों को लेकर उस बंजर टापू पर पहुंचे। लेकिन वहां उन्होंनेजो नज़ारा देखा, उसने उन्हें बुरी तरह बेचैन कर दिया। उन्होंने देखा कि टापू पर सैकड़ों सांप मरे पड़े हैं। आगे बढ़े तो पूरा नदी का किनारा मरे हुए जीव-जन्तुओं से अटा पड़ा एक मरघट-सा लग रहा था। मृत जानवरों के शव केकारण पैर रखने की जगह तक नहीं थी। इस दर्दनाक दृश्य ने पायेंग के किशोर मन को झकझोर दिया। हज़ारों की संख्या में निर्जीव जीव-जन्तुओं की निस्तेज फटी मुर्दा आंखों ने जाधव को कई रात सोने न दिया। जंगल के कमहोते जाने से पशु-पक्षियों की संख्या में कमी से तो पायेंग पहले से ही परिचित थे, लेकिन पेड़-पौधों के अभाव में ऐसी स्थिति भी आ सकती है यह अपनी आंखों से उन्होंने शायद पहली बार देखा था। गांव के ही एक आदमी ने चर्चाके दौरान विचलित जादव से कहा- 'जब पेड़ पौधे ही नहीं उग रहे हैं, तो नदी के रेतीले तटों पर जानवरों को बाढ़ से बचने आश्रय कहां मिले? जंगलों के बिना इन्हें भोजन कैसे मिले?' उन्होंने वन विभाग वालों से कहा की 'यहां आपकुछ पेड़ उगा दीजिये। पेड़ों के न होने की वजह से जीव मर रहे हैं।' लेकिन वन विभाग वालों ने कहा की 'यह बंजर ज़मीन है, यहां कुछ नहीं उग सकता। हां, अगर तुम चाहो तो वहां बांस के पौधे उगाकर देख सकते हो।' वन विभागवालों ने शायद यह बात मज़ाक में कही थी, पर पायेंग ने इसे गंभीरता से ले लिया।
काम को सलाम
2010- वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर जीतू कलिता ने जादव पायेंग पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनायी 'द मोलाई फॉरेस्ट'। यह फिल्म देश के नामी विश्वविद्यालयों में दिखायी गयी। आरती श्रीवास्तव ने अपनी फिल्म 'फॉरेस्टिंग लाइफ' में उनकी ज़िन्दगी के अनछुएपहलुओं और परेशानियों को दिखाया।
2012- जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय द्वारा सम्मानित।
2013- इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट ने पुरस्कार दिया।
2014- कनाडाई फिल्मकार मैकमास्टर की पायेंग पर 'फॉरेस्ट मैन' नाम से बनायी डॉक्यूमेंट्री फिल्म रिलीज हुई, जो विदेशी फिल्म महोत्सव में काफी सराही गयी। इसे कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले।
2015- भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजे गये।




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