रायपुर।/// राज्य शासन ने छत्तीसगढ़ मेडिकल
सर्विसेस कार्पोरेशन (सीजीएमएससी) के पूर्व प्रबंध संचालक श्री व्ही. रामाराव के
विरूद्ध राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो को जांच की अनुमति दी है। श्री व्ही.
रामाराव के छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन के प्रबंध संचालक के पद पर रहते
हुए डॉटा फाइल में छेड़छाड़ एवं कुछ विशेष सप्लायरों को लाभ पहुंचाने की शिकायत की
गई थी। राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 यथा संशोधित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 2018 की धारा 17 (क) के तहत इस शिकायत की जांच के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण
विभाग से अनुमति मांगी थी। स्वास्थ्य मंत्री श्री टी.एस. सिंहदेव ने शिकायत की
गंभीरता को देखते हुए श्री व्ही. रामाराव के खिलाफ ईओडब्लू को जांच की अनुमति दे
दी है। इस संबंध में विभाग द्वारा राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो को पत्र भी
जारी कर दिया गया है।
वैसे तो छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन शुरू से ही भ्रष्टाचार का एक
बड़ा केंद्र रहा है, यहां पर की जाने वाली खरीदी की
यदि सिलसिलेवार जांच की जाए तो सरकार के बहुत से अधिकारी जांच के
दायरे में आ जाएंगे, सलाइन खरीदी का मामला हो या डिस्टिल्ड वाटर खरीदने का मामला हो या आयुर्वेद
से संबंधित दवाइयों खरीदने का मामला हो इन सब की जांच अगर की जाए तो ऐसे बहुत से
सप्लायर और कंपनियां हैं जो वास्तव में उस लायक ही नहीं है, सूत्रों के अनुसार
धमतरी जिले में ऐसी कंपनियां हैं जो छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज में दावा से लेकर उपकरण तक बनती
हे और मैन्युफैक्चर के
नाम से सप्लाई करते हैं जैसे खांसी का सिरप को या सलाइन वॉटर जोकि बड़ी मात्रा में
कारपोरेशन द्वारा खरीदा जाता है इसमें अमानक कंपनियां सांठगांठ कर दवाइयां सप्लाई
करती आ रही हैं इसी तरीके से मेडिकल इक्विपमेंट खरीदने के मामले में भी भारी
भ्रष्टाचार की किया जाता है मामला कि अगर सिलसिलेवार जांच हो तो स्वास्थ्य के नाम
पर खिलवाड़ करने वाले का यह एक फलता फूलता अड्डा है |
वैसे तो सिरप खरीदी के
मामले में पूर्व प्रबंध निर्देशक व्ही रमा राव
का कहना है की मेरे ऊपर दबाव बनाया गया था पर जो भी प्रक्रिया अपनाई गई है
वह नियम अनुसार है अब सवाल ये उठता है की नियम क्या है , टेंडर के नियम कुछ इस
तरह के बनाए जाते हैं जिसमें चहेते
सप्लायर ओं को फायदा पहुंचे जैसे टर्नओवर की शर्त यह ऐसी शर्त है
जिसका उपयोग और दुरुपयोग आराम से हो जाता है दूसरा पूर्व में किए गए कामों का
उल्लेख जैसी अनावश्यक शर्तें लगाने से जो असली वेंडर है वह टेंडर ऑनलाइन पर नहीं
पाता या उसे तकनीकी तौर पर रिजेक्ट कर दिया जाता है और अपने चाहते सप्लायर ओं को
आने के लिए आसान रास्ता बना दिया जाता है ताज्जुब इस बात का है कि धमतरी जैसे जिले
में सैकड़ों मेडिकल दवाइयां और इक्विपमेंट बनाने की कंपनियां वहां एक- एक कमरे में चल रही हैं ना तो उनकी
कोई जांच करता है ड्रग कंट्रोलर को कभी उस और देखने की जरूरत नहीं पड़ती है हेल्थ जैसी
सर्विसेस पर इस तरीके का गोलमाल कितना खतरनाक होता है सरकारें अरबों
रुपए की दवाइयां इसी तरीके की कंपनियों से खरीद कर मरीजों को बांटते हैं मरीज
दवाइयां खाते रहते हैं पर बीमारी दूर नहीं होती |




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