अरुणाचल प्रदेश उत्तर पूर्व में भारतीय सीमा का आख़िरी राज्य है. राज्य की लगभग एक हज़ार किलोमीटर की सीमा चीन की सरहद से मिलती है. इसके अधिकांश सीमावर्ती क्षेत्रों पर चीन अपना दावा करता रहा है और इसे 'दक्षिण तिब्बत' कहता है.हालांकि, सीमा विवाद के बावजूद ख़ूबसूरत पहाड़ों, नदियों और जंगलों वाला अरुणाचल प्रदेश एक शांतिपूर्ण राज्य रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से यहाँ हालात बदले हैं और सीमावर्ती इलाक़ों में तनाव बढ़ा है.बीते साल लद्दाख़ में हुए भारत-चीन टकराव का असर 17 लाख की आबादी वाले अरुणाचल प्रदेश में भी दिखा है. यहां की कम ही ख़बरें जानने को मिल पाती हैं.
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अरुणाचल प्रदेश है तो भारत का राज्य, लेकिन यहां आप सीधे प्रवेश नहीं कर सकते. अरुणाचल प्रदेश जाने से पहले इनर लाइन परमिट लेनी होती है. इनर लाइन परमिट एक ख़ास दस्तावेज़ है जो अरुणाचल में बाहर से आने वाले लोगों को (भारतीय और ग़ैर-भारतीय सभी को) जारी किया जाता है.इनर लाइन परमिट मिलने के बाद आप अरुणाचल प्रदेश में . इस राज्य की आबादी ज़्यादा नहीं है . गाँव भी छोटे-छोटे और दूर-दूर बसे हैं. चीन की सीमा के पास के गाँव तक पहुँचने के लिए दुर्गम रास्तों से गुज़रना होता है. आगे हौलियंग क़स्बा है. ये कस्बा अन्जाव ज़िले का मुख्यालय है. चीन की सीमा से कुछ ही दूरी पर स्थित इस कस्बे में भारतीय सेना की बड़ी छावनी है.
यहाँ से सीमावर्ती इलाके के काहू और किब़तू गांव कुछ ही दूर पर हैं. ये पूरा इलाका सेना के अधिकार क्षेत्र में है. यहाँ का वॉर मेमोरियल वालंग को ख़ास बनाता है. दरअसल, 1962 में चीन ने बड़े क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था. युद्ध में चीनी फौज़ियों से इस क्षेत्र की रक्षा करते हुए हज़ारों सैनिकों ने जान गंवाई थी, उन्हीं की याद में यहाँ वॉर मेमोरियल बनाया गया है.एलएसी के पास के इस गाँव से चीन का गाँव भी दीखता है. ऊंची-ऊंची चोटियों उन्हीं के बीचही है एलएसी . इस गांव में भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती साफ़ देखी जा सकती है. दूसरी तरफ़ चीन के गांव से कुछ दूर पर पीपल्स लिबरेशन आर्मी का भी कैंट नज़र आता है.
मौजूदा समय में काहू गांव में बड़ी पाबंदियाँ हैं, लेकिन पहले से ऐसा नहीं था. मुश्किल से आठ से 10 घर वाला काहू गांव अमन पसंद इलाक़ा रहा है, लेकिन लद्दाख में जब से भारत और चीन के सैनिकों में टकराव हुआ है, यहाँ पर फ़ौजी सरगर्मियां देखी जा रही हैं. पाबंदियां और सैन्य गतिविधियाँ तेज़ी से बढ़ी हैं.तनाव साफ़ है. चीन के दावे के जवाब में भारत सरकार काहू गांव को पर्यटन स्थल के तौर पर बदल रही है. यहाँ अब घर में पर्यटकों के ठहरने के लिए स्टे होम बनाए जा रहे हैं.ख़ुद सरकार यहाँ बड़ा टूरिस्ट लॉज बनवा रही है. लॉज के नज़दीक नए सैन्य पुल का निर्माण भी किया गया है. इस पुल के आगे आम नागरिक नहीं जा सकते.

ऐसी जानकारी है कि चीनी सेना ने एलएसी के उस पार बड़े पैमाने पर बैरक टावर और फ़ौजी अड्डे बना लिए हैं. इस रिपोर्ट को करने के लिए,हें उससे पहले एक टीवी चैनल ने दावा किया था कि चीन ने राज्य के कुछ क्षेत्रों में गांव और फ़ौजी अड्डे बना लिए हैं.अमेरिका के रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में कहा था कि चीन ने भारत की सरहद के कई किलोमीटर के अंदर एक गांव निर्मित किया है. इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि अरुणाचल के सरहद के निकट चीनी फ़ौजियों की गतिविधियां काफ़ी बढ़ गई हैं.
सीमांत क्षेत्र मेचुका के भारतीय सांसद तपिर गाव एक अरसे से चीनी सैनिकों की गतिविधियों के बारे में आगाह करते रहे हैं. ईस्ट अरुणाचल प्रदेश से सांसद तपिर गाव का कहना हैं, ''सुबानसिरी में जहाँ 100 घर बने हैं, वो मैक मोहन लाइन के हमारे अंदर बने हैं. 1962 के बाद सैनिक क़ब्ज़ा करते रहे, क़ब्ज़ा करते रहे. वहाँ की सेना (चीनी सेना) ने एक क़ानून पास किया कि जहाँ अवैध तरीके से इनका अतिक्रमण हुआ है, वो उससे पीछे नहीं हटेंगे. इस तरह का लैंड लॉ सेना ने पास किया है.''सीमा के निकट बढ़ती चीन की गतिविधियों के बाद भारत ने तवांग, अन्जाव और मेचुका जैसे क्षेत्रों में अतिरिक्त सेना तैनात की है और भारी हथियार पहुंचाए हैं.
पासी घाट से विधायक नेनांग एरिंग कहते हैं, ''जैसे बोफ़ोर्स गन, हॉवित्जर गन हैं, इनको वहाँ पर पहुंचाया जा चुका है, पहले हमारा रिश्ता अच्छा था लेकिन जबसे डोकलाम में गड़बड़ हो गया, लद्दाख में दिक्क़त आई, तब से चीन का रवैया बदल चुका है. धीरे-धीरे वो (चीन) आक्रामक रूप में आ गए हैं.''तेजू से काहू और किबेतू की सड़कें चौड़ी की जा रही हैं. भारी सैन्य साज़ो सामान, ट्रक मशीनरी और सैनिकों की रफ़्तार और मोबिलिटी के लिए पहाड़ों को काटकर नई सड़क बनाई जा रही है. पहले से मौजूद सड़कों को बेहतर और मज़बूत किया जा रहा है. पुराने पुलों की जगह दर्जनों नए पुल बनाए जा रहे हैं.




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