रायपुर //// देश इस समय अभूतपूर्व बिजली संकट के मुहाने पर है। देश भर की बिजली की जरूरत मुख्यतः थर्मल पॉवर से पूरी होती है जिसके लिए जरूरी कोयले के आपूर्ति विद्युत संयंत्रों को नहीं मिल पा रही है। कई राज्यों में विद्युत आपूर्ति में कटौती की जा रही है।
अडानी, एस्सार और टाटा के बिजलीघर आयातित कोयले के मंहगे होने से अपने पीपीपी का उल्लंघन करते हुए बंद हो गये हैं, नतीजतन गुजरात सरकार को बिजली कटौती से बचने के लिए पंद्रह रुपए प्रति यूनिट की दर से लगभग डेढ़ सौ करोड़ रुपए की बिजली रोज खरीदनी पड़ रही है।
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जनवरी से जो बिजली के बिल आएंगे उसमें गुजरातियों से यह पैसा वसूलने का उपक्रम होगा। यह कानूनी व्यवस्था है, यानि बिजली महंगी हो गई है। कोयले की कमी के चलते नेचुरल गैस से चलने वाले बिजली घरों की डिमांड भी आसमान पर है और नेचुरल गैस भी मंहगी हो गई है।
गुजरात का संदर्भ इसलिए लिया कि वह हिंदुत्व के साथ-साथ निजीकरण की भी प्रयोगशाला है। गुजरात में प्रायवेटाइजेशन विकास का मंत्र है। पर जिन निजी हाथों में हम बिजली व्यवस्था सौंपने के लिए आतुर हैं वह किसी भी कठिनाई के समय या तो अपने हाथ खड़े कर देते है या आपदा में अवसर ढूंढने लगते हैं। याद कीजिये ओडिशा में जब महाचक्रवात आया था और बिजली के लाखों खंबे और टॉवर जमीदोज हो गए थे, तब वहां की निजी वितरण कंपनी एईएस अपने दफ्तर में ताला लगा कर चंपत हो गई थी।
देश भर के इन अनुभवों से छत्तीसगढ़ को सबक लेने की जरूरत है क्योंकि यहां बिजली की व्यवस्था तेजी बिगड़ती जा रही है। कम्पनियों की आर्थिक हालत खराब है। पांच कंपनियों को एक या दो कंपनियों में पुनर्गठित किये जाने का काम टलता जा रहा है। कंपनी के मैनेजमेंट में तदर्थवाद का बोलबाला है।
छत्तीसगढ़ इस संकट में सबसे कम प्रभावित इसलिए दिख रहा हैं क्योंकि छत्तीसगढ़ में यह बिजली की कम मांग का समय है। बारिश भी इस साल अच्छी हुई है। छत्तीसगढ़ में फरवरी के बाद मांग तेजी से बढ़ती है। अभी औसतन 3800 मेगावॉट की मांग में से आधी हम खुद के विद्युत संयंत्रों से पूरी कर लेते हैं। बाकी केंद्रीय कोटे बिजली मिल जाती है। दूसरे राज्यों की तरह हम निजी पॉवर हाऊस और एक्सचेंज में बिकने वाली बिजली के भरोसे नहीं हैं। पर ज्यादा दिन यह स्थिति नहीं बनी रहेगी। जब छत्तीसगढ़ राज्य बना था तब औसत मांग सिर्फ 900 मेगावॉट थी जो शीर्ष पर 1300 मेगावॉट तक पहुँच जाती थी। तब राज्य में बिजली सरप्लस थी।अब स्थिति और तेजी से बदल रही है। जरूरी है कि हम निजीकरण की भेड़चाल में चलने के बजाय अपने योग्य इंजीनियरों के ज्ञान और अनुभव से अपनी नीतियां बनाएं। छत्तीसगढ़ के इंजीनियरों द्वारा समय-समय पर दिए गए सुझावों को अन्य राज्यों द्वारा तक अपनाया गया है। बेहतर होगा विद्युत विकास का हम अपना मॉडल विकसित करें और देश के सम्मुख विद्युत प्रस्तुत करें।




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