
कवी सुरेन्द्र शर्मा
जो राधा कान्हा कान्हा कहते थकती नहीं थी उसके मुख से अनायास द्वारकाधीश का संबोधन सुनकर कृष्ण अंदर तक घायल हो गए अपने आप को संभाला और बोले बहुत दिनों बाद मिले हैं आओ बैठते हैं कुछ आप अपनी सुनाओ कुछ मैं अपनी सुनाता हूं सच बोलो राधा तुम्हारी बहुत याद आती थी और इन आंखों में आंसू भी भर आते थे राधा बोले मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं होगा ना मुझे तो आपकी याद आई ना मेरे आंखों से आंसू निकले एक बात और कहूं आप तो सदा मेरी आंखों में रहते थे में खाभी रोई नहीं रोटी तो आंख में आंसू आते तो उस में बहकर बाहर आप निकल जाने का दर था मैं तो कभी आपको भूल ही नहीं तो याद आने का कोई प्रश्न ही नहीं
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द्वारकाधीश प्रेम से अलग होने पर आपने क्या खोया उसका कुछ आईना दिखाओं मेरे कड़वे बोल सुन पाओगे तो सुनाओ यमुना के मीठे पानी सेसे जिंदगी शुरु की और समुद्र के खारे पानी में पहुंच गए एक उंगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्र पर भरोसा कर लिया और 10 उंगलियों पर चलने वाली बांसुरी भूल गए कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे जो ऊंगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी प्रेम से अलग होते होने पर वही ऊंगली क्या क्या रंग दिखाने लगी सुदर्शन चक्र उठाकर बिना के काम आने लगी कान्हा और द्वारकाधीश में क्या फर्क होता है बताओ कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है युद्ध में आप मिटाकर जीते ते हो और प्रेम आप मिटकर ही जीत ते हो गाना प्रेम में खोया व्यक्ति दुखी हो सकता है वह दूसरों को दुख नहीं देता
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स्वर्ग में विचरण करते हुए राधा और कृष्ण एक दूसरे के सामने आ गए राधा को देख कृष्ण छोड़ा विचलित हो गए राधा मुस्कुराए के पहले की कृष्ण कुछ बोलते राधा बोली कैसे हो द्वारकाधीश जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह कर पूरे वृंदावन में धूम मचा दी थी अचानक उसके मुख से कृष्ण कान्हा की जगह द्वारकाधीश सुनकर कृष्ण ऊपर से नीचे तक हिल गए




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