कंधार //// इस संकट को खत्म करने के लिए तत्कालीन वाजपेयी सरकार कमांडो ऑपरेशन चलाना चाहती थी लेकिन संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने इसमें भारतीय ऑफिसर्स की मदद करने से इनकार कर दिया था.
भारत ने पिछले दिनों अपने एक फैसले से कूटनीति के सभी विशेषज्ञों को चौंका दिया है. भारत की तरफ से पहली बार अफगानिस्तान तालिबन के सभी धड़ों और नेताओं के साथ वार्ता का रास्ता खोला गया है. भारत उसी तालिबान से वार्ता करने वाला है जिसने सन् 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC814 की हाइजैकिंग के साथ देश को एक बड़ा जख्म दिया था. इस हाइजैकिंग को आज भी सबसे बड़ी आतंकी घटनाओं में गिना जाता है. कुछ लोग भारत सरकार से कह रहे हैं कि तालिबान के साथ वार्ता करने से पहले एक बार 21 साल पहले मिले दर्द को भी ध्यान में रख लेना चाहिए.
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24 दिसंबर 1999 को नेपाल के काठमांडू स्थित त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर इंडियन एयरलाइंस के पैसेंजर प्लेन आईसी-814 आतंकियों ने हाइजैक कर लिया था. इस हाइजैकिंग में पाकिस्तान के आतंकी संगठन हरकत-उल-मुजाहिद्दीन ने हाइजैक किया था. इस प्लेन में कुल 191 लोग सवार थे. इसे हाइजैक करने के बाद आतंकी इसे पहले इसे अमृतसर, लाहौर और फिर दुबई ले गए. दुबई में 27 यात्रियों को छोड़ दिया गया था.
कहा जाता है कि इस संकट को खत्म करने के लिए तत्कालीन वाजपेयी सरकार कमांडो ऑपरेशन चलाना चाहती थी लेकिन संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने इसमें भारतीय ऑफिसर्स की मदद करने से इनकार कर दिया था. यहां लाहौर से दुबई के रास्ते होते हुए इंडियन एयरलाइंस के इस प्लेन ने अगले दिन सुबह करीब 8:30 अफगानिस्तान के कंधार में लैंडिंग की थी. यात्रियों से भरी इस फ्लाइट के हाइजैक होने की खबर ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी. अपहरण होने के कुछ ही घंटों बाद आतंकवादी अपनी मांग रख चुके थे. इससे पहले आतंकियों ने एक यात्री रूपन कात्याल की हत्या कर दी थी.
जिस समय प्लेन ने दुबई में लैंडिंग की थी, उस समय उसने फ्यूल भरवाया और यहीं पर यात्रियों की रिहाई के लिए आतंकियों ने शर्त रखी. दुबई में ही जिन 27 यात्री रिहा किय गया था उसमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे. इसके एक दिन बाद डायबिटीज से पीड़ित एक व्यक्ति को रिहा कर दिया गया. कंधार में पेट के कैंसर से पीड़ित सिमोन बरार नाम की एक महिला को कंधार में इलाज के लिए सिर्फ 90 मिनट के लिए विमान से बाहर जाने की इजाजत दी गई.
आतंकियों ने भारत सरकार के सामने 36 आतंकी साथियों की रिहाई के साथ ही 200 मिलियन डॉलर की फिरौती की मांगी थी. आतंकी एक कश्मीरी अलगाववादी के शव को सौंपे जाने की मांग पर भी अड़े थे. मगर तालिबान के समझाने पर उन्होंने पैसे और शव की मांग छोड़ दी. लेकिन वो अपने 36 साथियों की रिहाई की मांग पर अड़े हुए थे. हर कोई सोच रहा था कि कहीं तालिबान कोई बड़ा कदम न उठा ले. फिर तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने बयान दिया और कहा कि तालिबान ने कहा है कि कंधार में कोई खून-खराबा नहीं होना चाहिए.

भारतीय यात्रियों के अलावा इस प्लेन में ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, कनाडा, फ्रांस, इटली, जापान, स्पेन और अमेरिका के नागरिक भी सवार थे. सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा था और फिर सरकार तीन खतरनाक आतंकियों को छोड़ने पर राजी हुई. कई दिनों तक चली बातचीत के बाद यात्रियों के बदले तीन आतंकियों मसूद अजहर, उमर शेख और अहमद जरगर को छोड़ने की बात पर रजामंदी.
आठ दिनों के बाद 31 दिसंबर को तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह इन तीनों आतंकियों को लेकर कंधार पहुंचे और यात्रियों की रिहाई सुनिश्चित की. मसूद अजहर आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का फाउंडर है और पुलवामा जैसे आतंकी हमलों का मास्टरमाइंड है.
भारत ने पिछले दिनों अपने एक फैसले से कूटनीति के सभी विशेषज्ञों को चौंका दिया है. भारत की तरफ से पहली बार अफगानिस्तान तालिबन के सभी धड़ों और नेताओं के साथ वार्ता का रास्ता खोला गया है. भारत तालिबान के नेता मुल्ला बरादर के साथ सभी नेताओं के साथ बातचीत करेगा. भारत की तरफ से यह फैसला तब किया गया है जब अफगानिस्तान से करीब 50 फीसदी अमेरिकी फौजें जा चुकी हैं. जिस तालिबान के साथ भारत वार्ता करने वाला है, उसने सन् 1999 में IC814 की हाइजैकिंग के साथ भारत को एक बड़ा जख्म दिया था.
रक्षा विशेषज्ञों मानें तो भारत की यह रणनीति पहले की सरकारों से एकदम उलट है. अफगानिस्तान युद्ध के 20 साल पूरे होने वाले हैं. जिस समय अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपनी सेनाओं को भेजा था तो भारत ने खुद को इस पूरे मसले से बिल्कुल अलग कर लिया था. जहां अब अमेरिकी सेनाएं अफगानिस्तान से लौटने को तैयार हैं तो वहीं यह भी सच है कि तालिबान कहीं नहीं जाने वाला है.
राजनयिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने एक इंटरव्यू में कहा कि बहुत से लोगों को लगने लगा है कि तालिबान अब भारत की जरूरतों को समझने लगा है. उन्होंने साल 1999 का वो वाकया याद दिलाया जब भारतीय एयरक्राफ्ट को रिहा कराने के लिए भारत सरकार को तालिबान के साथ समझौता करना पड़ा और तीन आतंकियों को रिहा करना पड़ा. चेलानी के मुताबिक भारत का वो फैसला उसके लिए ही मुसीबत साबित हो गया था.
तालिबान और पाकिस्तान दोनों ही कभी नहीं बदलने वाले हैं. तालिबान की कट्टर इस्लामिक नीतियां भारत के लिए बड़ा खतरा हैं. उन्होंने कहा कि सन् 1999 के बाद से तालिबान नहीं बदला है और न ही कभी बदलेगा. चेलान की मानें तो भारत, तालिबान के साथ कोई औपचारिक संबंध नहीं शुरू करने वाला है. ब्रह्म चेलानी के मुताबिक आज वार्ता के लिए रास्ता खोला गया है. उनका कहना है कि तालिबान के साथ वार्ता का रास्ता खुलना भारत के लिए कोई फायदेमंद सौदा साबित नहीं होगा. लेकिन भारत को यह बात भी मालूम है कि आज अफगानिस्तान के एक बड़े हिस्से पर तालिबान का कब्जा है. ऐसे में कम्युनिकेशन लाइन को खोलने के कोई नकरात्मक पहलू भी नहीं हैं.

तालिबान के लड़ाकों की कई संख्या कई लाखों में है. इसके अलावा संगठन के कई समर्थक हैं. तालिबान अफगानिस्तान के कई प्रांतों और जिलों पर हावी है. भारत की तरफ से नवंबर 2020 में अफगानिस्तान को 80 मिलियन डॉलर की मदद देने का ऐलान किया गया था. यह रकम कुछ 150 प्रोजेक्ट्स के लिए जारी की गई थी. विशेषज्ञों की मानें तो इस रकम के साथ ही भारत ने इस तरफ इशारा कर दिया था कि किसी भी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के सफल होने के लिए सरकार के अलावा तालिबानी लड़ाकों के साथ भी अच्छे संबंध जरूरी हैं. भारत इस समय अफगानिस्तान के 34 प्रांतों में डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स को पूरा करने में लगा हुआ है.
तालिबान के कई फील्ड कमांडर्स ऐसे हैं जिन्होंने अपने दम पर कई प्रांतों में ग्रुप बना लिए हैं. दोहा में जिस समय शांति वार्ता हुई थी, उस समय मुल्ला बरादर ने हिंसा को कम करने की बात कही थी. अफीम पर आधारित अर्थव्यवस्था के अलावा 4 बिलियन डॉलर या इससे ज्यादा की माइनिंग इकॉनमी अफगानिस्तान में है. रिपोर्ट्स की मानें तो अफगानिस्तान की करीब 75 फीसदी खदानों पर तालिबान का कब्जा है. भारत किसी भी तरह कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता है. कहीं न कहीं इस वजह से भी भारत ने तालिबान के साथ वार्ता के दरवाजे खोले हैं.




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