रायपुर /// पिछले एक सप्ताह से हो रही लगातार बारिश में ₹ 25 किलो में खरीदे गए धान की लाखों बोरियां भीग कर डूब गई हैं, मौसम को लेकर पूर्वानुमान की खबरें लगातार सोशल मीडिया से लेकर अखबारों में छप रही थी, मौसम विभाग ने चेतावनी जारी करते हुए कहा भी था कि पश्चिम बंगाल में बन रहे हवा के कम दबाव के कारण और उत्तर की ओर हो रही लगातार बारिश से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ ,उड़ीसा, महाराष्ट्र का कोस्टल इलाका छोड़कर बाकी जगह तेज आंधी के साथ तेज बारिश होने की संभावना है इसके बावजूद मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के खाद्य विभाग के अधिकारियों ने उस चेतावनी को दरकिनार करके खुले में रखे अनाज के साथ बहुत ही क्रूरता का व्यवहार किया है ,|

सरकार के पास वैसे भी अनाज रखने की कोई माकूल व्यवस्था नहीं है ,वह तो सिर्फ राजनीतिक घोषणाओं के कारण अनाज खरीद लेती है और उसको खुले में रखकर सढ़ने के लिए छोड़ देती है, हर साल इसी तरीके से हजारों टन बल्कि लाखों टन धान और गेहूं की फसल बर्बाद हो जाती है सरकारी कर्मचारी इस आपदा में भी अवसर खोज लेते हैं 100 किलो धान खराब होती है तो 100 बोरा दिखा देते हैं और पूरा माल अंदर कर लेते हैं |
सरकारी घोषणाओं के अनुसार इस तरीके की खाद्यान खरीदी के पीछे पिछले 10 वर्षों से सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक कारण ही सामने आ रहे हैं, सरकार किसानों की उन्नति के लिए समर्थन मूल्य पर लाखों टन धान खरीद लेती है जिसकी कीमत ₹25 किलो के हिसाब से लगाई जाए तो

करीब 20 से 22 हजार करोड़ की होते हैं यह पैसा सरकारी खजाने से किसानों को दिया जाता है और फिर उस खरीद गई धन को बेचकर खजाने में पैसा वापस लाया जाता है कहने में प्रक्रिया बहुत सरल लगती है ,लेकिन हर साल सरकार को 10 से 15 हजार करोड़ का चूना लग जाता ही है यह 10 से 15 हजार करोड ना तो उन नेताओं का है और ना ही उन पार्टियों का है जो अपने घोषणापत्र में घोषणा कर देती है कि हम आपको उचित मूल्य पर आपके अनाज को खरीदेंगे |
यह पैसा टेक्स पेयर का है जो व्यापार करके सरकार के खजाने में टैक्स जमा करते हैं जिसे संविधान के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के मद पर खर्च होना चाहिए लेकिन सरकारें उस पैसे को अपने घोषणा पत्र में दिए गए वोट बैंक के लालची वादे के तहत खर्च करती हैं कहने का मतलब है कि सरकारी धन से वह वोटों को खरीदते हैं यह एक सरकार की खानी नहीं है दिल्ली से लेकर कन्याकुमारी तक जितनी भी सरकार हैं इसी तरीके से अपनी सत्ता बचा कर राजगद्दी पर बैठी हुई हैं कोई दो रुपए किलो चावल दे रहा है ,कोई धान में बोनस दे रहा है, कोई फ्री में सिलेंडर बांट रहा है, तो कोई सीधे किसान के खाते में पैसे डाल रहा है, यह पैसा किसका है और इस पैसे का किस तरह से उपयोग होना चाहिए को लेकर कहीं कोई चर्चा भी नहीं है क्योंकि इस तरह का लालच देकर सत्ता में बने रहने के इस फार्मूले में सारी पार्टियां और राज्य एकमत हैं |




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