रायपुर/// हमारे संवाददाता ने शहर के उन बड़े अस्पतालों के बाहर जहां पर ग्रामीण क्षेत्र और उप नगरी क्षेत्रों से सबसे ज्यादा मरीज चाहे ,कोविड-19 मरीज हों या और दूसरे पेशेंट हों आते हैं , उनकी दुर्दशा पर एक रिपोर्ट तैयार कर फाइल की है ,संवाददाता का कहना है कि शहर के बड़े हॉस्पिटल जहां पर ग्रामीण और उप नगरी क्षेत्र के मरीज आते हैं उन अस्पताल के प्रांगण में जमीन खरीद-फरोख्त के दलाल भी सक्रिय रहते हैं खेल बड़े ही तरीके से होता है बड़े अस्पतालों में जैसे ही मरीज भर्ती होता है वैसे ही एक बड़ी रकम की मांग कर दी जाती है ग्रामीण परिवेश से आए हुए मरीज तो आर्थिक संकट से गुजरता ही है ऊपर से अपने चाहते की जान बचाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता है
जैसे ही अस्पताल द्वारा पैसा जमा करने की डिमांड आती है उस गरीब ग्रामीण के हाथ पैर फूलने लगते हैं उसके चेहरे को देखकर दलाल पहचान लेता है और मदद करने के लिए वह कुछ इस तरीके से बातचीत शुरू करता है किस गांव से आए हो कितनी जमीन है कौन बीमार है तुम्हारा वगैरा-वगैरा फिर वह कहता है कि मैं पैसे तुमको दिलवा दूंगा कितना ब्याज लगेगा और जमानत के रूप में आपको अपनी जमीन गिरवी रखना पड़ेगी अगर आपने समय सीमा पर जमीन उठा ली तो ठीक है वरना हम इसकी रजिस्ट्री करवा लेंगे |
चतुर दलाल मरीज की पूरी हिस्ट्री जानने के बाद उस गांव में जमीन का क्या रेट चल रहा है यह भी उसे बताता है और उसकी आधी कीमत पर वह जमीन खरीदने का एग्रीमेंट करके उसे रकम दे देता है रकम मिलते हैं मरीज की परवरिश करने वाला दौड़ते हुए अस्पताल के अकाउंट काउंटर पर जाता है और वह पैसे जमा करके फिर वापस आकर वेटिंग हॉल में मरीज के अच्छे होने का इंतजार करने लगता है हर रोज इसी तरीके से सेकड़ों मरीजों की जमीनों के बदले अस्पतालों में पैसे जमा हो रहे हैं एक और ये बड़े अस्पताल अपनी तिजोरी भरने में लगे हैं वहीं दूसरी ओर जमीन दलाल वास्तविक जमीन की आधी कीमत पर उन्हें अच्छे तगड़े ब्याज पर फाइनेंस लगातार देता रहता है इस बीच किस्मत अच्छी हुई रही तो मरीज बच गया तो तो ठीक है, नहीं तो मरने के बाद अंत में डॉ और अस्पताल संचालक कहते हैं कि इतने पैसे और जमा कर दो और अपने डेड बॉडी को लेते जाओ |
इस तरीके के दृश्य आमतौर पर उन अस्पतालों के अस्पताल के प्रांगण में देखने मिल जाते हैं संचालक और अस्पताल के कर्मी भी इन जमीन दलालों को जानते हैं बकायदा नमस्कार चमत्कार भी होती रहती है मुस्कुराहट का आदान-प्रदान भी होता है देखने मिल जाते हैं, जिन अस्पतालों का नेटवर्क ग्रामीण इलाकों तक फैला हुआ है, ग्रामीण इलाके के डॉक्टर विशेष तौर पर उन हॉस्पिटल में मरीजों को भेजते हैं उनका कमीशन भी तय होता है यहां मरीज पहुंचते ही बिल और बिल का सिलसिला शुरू हो जाता है और इस तरह जमीन खरीदने और बेचने का भी सिलसिला भी लगातार जारी रहता है सरकार को इस तरह के प्रांगण में स्टिंग ऑपरेशन करना चाहिए मरीजों को इस जंजाल से मुक्ति दिलाने चाहिए और ऐसे मरीजों की जमीन अगर वह गिरवी रखना चाहता है तो बैंक को सक्रिय होकर उसकी जमीन रखकर को पैसा देना चाहिए ताकि तो उसको जमीन का उचित मूल्य मिले और वह अपना कर्जा भी उचित व्याज पर चुका सकें और अपना इलाज भी करा सके यह सब धरातल की हकीकत है जिसे सरकार इग्नोर कर रही हैं सरकार बड़े बड़े दावे करती है कि हम ने गरीबों के लिएयह किया है गरीबों के लिए वह किया है जितनी भी तरह की की योजनाएं हैं वह इन हॉस्पिटलों में 1 दिन में खत्म हो जाती है उसके बाद मरीजों का तब तक इलाज नहीं किया जाता है जब तक एडवांस पैसा नहीं जमा किया जाता है
सुबह और शाम बकायदा मरीजों के परिजनों को बुलाया जाता है और उनको रकम जमा कराने की छोटी-छोटी पर्ची दे दी जाती है पर्ची तो छोटी होती है लेकिन उसमें रकम बड़ी होती है और सबसे ताजुब की बात यह है कि डिस्चार्ज करते वक्त किसी तरीके का बिल उस मरीज के साथ ही नहीं देते हैं मांगने पर भी नहीं देते क्योंकि इन्हें मालूम है कि अगर यह बिल लेकर यह मेडिकल बोर्ड में गया तो बढ़ी करवाई भी हो सकती है मरीज की जितनी भी तरीके की जांच हुई है उनको लेकर अगर मरीज मेडिकल बोर्ड के सामने चला गया तो इन अस्पतालों का लाइसेंस भी केन्सिल हो सकता है अस्पताल संचालक इतने होशियार हैं कि वह कोई दस्तावेज देते ही नहीं किस तरीके की जांच हुई है वह बताते ही नहीं हैं कि वो सिर्फ पैसा जमा करते हैं और मरीज को सोंप देते हें




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