रईस अहमद 'लाली'
क्या भाजपा की हार अब तय हो चुकी है? क्या प्रधानमंत्री के पद से नरेंद्र मोदी की विदाई सुनिनिश्चित है? देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा? क्या राहुल गांधी की किस्मत चमकने वाली है? या फिर 'डार्क हॉर्स' के तौर पर मराठा क्षत्रप शरद पवार का नाम सामने आ सकता है? आखिर कांग्रेस इस चुनाव में कितनी सीटें हासिल कर सकती है? 2019 के लोकसभा चुनाव में तीन चरणों के मतदान के बाद ऐसे तमाम सवाल सियासी फ़िज़ाओंं में उभरने लगे हैं। मतदाताओं के बीच तो नतीजों को लेकर कयास लग ही रहे हैं, सियासी गलियारों में भी परिणाम के बाद की परिस्थितियों के लिए अभी से ज़रूरी जोड़-घटाव शुरू हो गया है। जाहिर है कि जब तीन सौ से ज्Þयादा सीटों पर मतदान संपन्न हो चुके हैं, तो नतीजों को लेकर कुछ-कुछ संकेत भी नज़र आने लगे हैं। संकेत बहुत हद तक बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। यानी केंद्र की सत्ता बदल भी सकती है। प्रधानमंत्री मोदी की कुर्सी छिन सकती है।
ऐसे नतीजे की आशंका भाजपा के भीतर से भी जतायी जा रही है। यह अलग
बात कि मतदान के दौर अभी बाकी होने के कारण सार्वजनिक तौर पर ऐसा कहने की हिम्मत
कोई नहीं जुटा पा रहा। हां, अनौपचारिक बातचीत में एनडीए के कई नेता ज़रूर यह स्वीकार कर रहे हैं
कि इस बार भाजपा गठबंधन की सीटें 200 के आसपास ठहर सकती हैं। ऐसी आशंकाएं निराधार नहीं हैं। तीन दौर के
मतदान से एक चीज़ तो स्पष्ट है कि इस बार मतदाताओं के बीच मोदी नाम की कोई लहर नहीं
है। अलग-अलग सूबों में भाजपा ने जो गठबंधन किये हैं, उससे भी उसे बहुत लाभ मिलता नज़र
नहीं आ रहा। उलटे सहयोगी दलों की किसी न किसी ग़लती से खेल और खराब हुआ है। उदाहरण
के लिए बिहार में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की आलोचना के लिए जद (यू) नेताओं
ने लगातार जैसी भाषा का इस्तेमाल किया, उससे महागठबंधन ने पूरे चुनाव को
अगड़ा बनाम पिछड़ा करने में कामयाबी हासिल कर ली। वर्ना चुनाव के एक दौर के मतदान तक
एनडीए ही यहां बढ़त बनाये हुए था। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अपने लिए चुनौती को
समझते हुए इस बार ओबीसी वोटरों पर दांव लगाया था, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में उसके
छोटे-बड़े सहयोगियों ने ऐसा कारनामा किया कि यहां भी ओबीसी वोट सपा-बसपा गठबंधन की
ओर जाता दिखायी पड़ा है। महाराष्ट्र में शिवसेना सहयोगी होने के बावजूद अपने
मुखपत्र 'सामना' के जरिये मोदी सरकार को लेकर जैसी भाषा इस्तेमाल कर रही है, उससे वहां का
मतदाता भ्रमित हुआ है। ऊपर से शिवसेना से अलग हुई राज ठाकरे की पार्टी जिस तरह खुलकर
एनडीए के ख़िलाफ़ नयी तकनीकों के सहारे प्रचार कर रही है, उससे
कांग्रेस-राकांपा की संभावनाएं बढ़ी हैं। बंगाल से ख़बरें आ रही हैं कि ममता बनर्जी
के तृणमूल पर थोक से वोट पड़ रहे हैं। पूर्वोत्तर में नागरिक संशोधन विधेयक के मसले
पर भाजपा अपने पैर पर पहले ही कुल्हाड़ी चला चुकी है। गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पं
लेकिन सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस इतनी सीटें ला रही है कि वह अपने नेतृत्व में सरकार बनाने में कामयाब हो? मतदान के रुझान को देखते हुए इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि उसका प्रदर्शन पिछली बार के मुकाबले काफी बेहतर होने वाला है। लेकिन बहुमत से वह काफी दूर रह सकती है। कांग्रेस के नेता भी मान कर चल रहे हैं कि इस बार उनकी पार्टी का आंकड़ा लगभग 200 तक पहुंच सकता है। इसी दिशा में वे रणनीति के साथ काम कर रहे हैं। कांग्रेस चाह रही है कि किसी भी तरह उसकी सीटें भाजपा की सीटों से ज्Þयादा आये ताकि चुनाव पश्चात गठबंधन का रास्ता उसके पक्ष में बनने में आसानी हो। पार्टी के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी कहते हैं, 'कांग्रेस बहुत अच्छा प्रदर्शन करेगी, लेकिन कांग्रेस को अपने दम पर बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। इसलिए दिल्ली में नयी सरकार के लिए चुनाव के बाद गठबंधन ज़रूरी है। यह तय हो गया है कि सत्तारूढ़ भाजपा शासन में आने में सफल नहीं होगी, क्योंकि इन्हें पर्याप्त सीटें नहीं मिलेंगी और न ही इनके साथ कोई गठबंधन करने जा रहा है।'
अगर एनडीए या यूपीए में से किसी को बहुमत हासिल नहीं होता है, जैसा कि होता दिख भी रहा है, तो त्रिशंकु स्थिति में संसद का सिरमौर कौन हो सकता है? इसके लिए 23 मई का इंतज़ार करना ज़रूरी है। माना जा रहा है कि अगर कांग्रेस यूपीए गठबंधन को मिलाकर 200 का आंकड़ा पार करेगी, तो वह राहुल गांधी के नेतृत्व में सरकार बनाने का फैसला ले सकती है। ऐसी स्थिति में वह एनडीए के कुछ उन सहयोगियों को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेगी, जिनकी राजनीति का मिज़ाज धर्मनिरपेक्षतावादी हो। वह इसलिए कि सरकार बनाने के बाद कांग्रेस को किसी के ब्लैकमेल या दबाव का ज्Þयादा सामना न करना पड़े। लेकिन यह स्थिति तब आयेगी जब कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए 200 सीटों का आंकड़ा आराम से पार करे। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो क्या होगा?
कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने इसके लिए भी विचार-मंथन शुरू कर दिया है। त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति में अगर उसके पास बहुत उपयुक्त आंकड़ा नहीं रहा, तो वह विपक्षी गठबंधन की सरकार बनाने की ओर मदद का हाथ बढ़ाएगी। ऐसे में कुछ नाम सामने आ सकते हैं। इनमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार, तृणमूल की ममता बनर्जी, बीजद के बीजू पटनायक, आंध्र से चंद्रबाबू नायडु, उत्तर प्रदेश से मायावती शामिल हैं। जाहिर है इसमें शरद सबसे आगे हो सकते हैं। कारण, उनकी छवि ऐसी है जिस पर शायद ही किसी विपक्षी पार्टी को ऐतराज हो। इसके अलावा प्रधानमंत्री बनने की उनकी लम्बे समय से ख्वाहिश के बारे में भी सभी जानते हैं। थक-हारकर ही इस बार उन्होंने एक तरह से राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया और चुनाव से दूरी बनायी। मगर यह कोई बड़ी बाधा नहीं है। अगर उनके नाम पर सहमति बनी, तो वे उपचुनाव जीत कर भी संसद के सदस्य बन सकते हैं। जैसे-जैसे मतदान के दौर बीत रहे हैं, उनको लेकर सुगबुगाहटें शुरू भी हो गयी हैं। एक खेमा अभी से उनकी राह बनाने में जुट गया है।
बहरहाल, भाजपा का भी एक खेमा मोदी की जगह नितिन गडकरी को आगे करने की कोशिश कर रहा है। इस आशंका में कि बहुमत न आने की स्थिति में भाजपा गडकरी के चेहरे को आगे कर समर्थन जुटा सकती है। संघ ने तो बहुत पहले इस ओर इशारा कर दिया था। शायद मतदान से पहले ही उसे अंदेशा हो चुका था कि मोदी की विदाई तय है। उसके तमाम आंतरिक सर्वेक्षण इस ओर इशारा कर रहे थे कि नोटबंदी, जीएसटी, बेरोज़गारी जैसे मसलों ने भाजपा का नुकसान कर दिया है और उसकी भरपायी शायद अब संभव नहीं। मतदान के बीतते चरणों के साथ वह आशंका धरातल पर उतरती साफ नज़र भी आ रही है। फिर भी आखिरी तस्वीर के लिए 23 मई का इंतज़ार करना होगा। नतीजों के ऐलान का। क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव का खेल भी अब टी-20 क्रिकेट की तरह रोमांचक हो चला है।




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